हैदराबाद - हैदराबाद, कारवान स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 4 सितंबर 2026 को जन्माष्टमी के पावन अवसर पर चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में वासुदेव श्रीकृष्ण के जीवन और गीता के उपदेशों को जीवन को दिशा देने वाला बताते हुए कहा कि भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि में कृष्ण का जन्म हुआ। कृष्ण पक्ष अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इसी प्रकार मनुष्य को भी अपने जीवन में अज्ञान, मोह, राग-द्वेष और कर्मबंधनों के अंधकार से निकलकर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना चाहिए।
आचार्य श्री ने गीता के संदेश का उल्लेख करते हुए कहा कि इंद्रियों के विषय केवल सुख देने वाले नहीं होते, बल्कि अंततः दुख के कारण भी बन सकते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति ऐसे भोगों में आसक्त नहीं होता। वर्षा ऋतु का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जैसे वर्षा तभी उपयोगी होती है, जब भूमि उर्वरा हो, उसी प्रकार परमात्मा की वाणी भी तभी जीवन में फल देती है, जब हमारा मन और हृदय उर्वरा हो। प्रवचन, सामायिक, आराधना, तप, पूजा और सेवा इसी उर्वर अंतःकरण के लक्षण हैं।
गुरुदेव ने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष के चंद्रमा के माध्यम से जीवन की दिशा समझाते हुए कहा कि शुक्ल पक्ष में प्रकाश बढ़ता है, जबकि कृष्ण पक्ष में प्रकाश घटता है। कृष्ण का कृष्ण पक्ष में जन्म इस बात का प्रतीक है कि हमारी जीवन-यात्रा अंधकार से प्रकाश की ओर होनी चाहिए। आज मनुष्य ने प्राकृतिक जीवन छोड़कर बनावटी वातावरण अपना लिया है और धीरे-धीरे उसका जीवन भी बनावटी होता जा रहा है। हृदय में दर्द होते हुए भी मुस्कुराना और आनंद होते हुए भी कृत्रिम भाव दिखाना इस बात का संकेत है कि कहीं हम अपना वास्तविक चेहरा तो नहीं खो रहे हैं।
उन्होंने कहा कि कृष्ण का जन्म कारागार में हुआ, जो बंधन का प्रतीक है। इसी प्रकार हम सभी कर्मों के बंधन में हैं और हमारी यात्रा भी मुक्ति की ओर होनी चाहिए। कर्मों का फल प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं भुगतना पड़ता है। इसलिए जीवन में राग और द्वेष के दो पाटों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
कृष्ण के नटखट बाल्यकाल, गोपियों के निष्काम प्रेम और सुदामा के साथ उनकी मित्रता का उल्लेख करते हुए कहा कि सच्ची मित्रता पद और संपत्ति नहीं देखती। द्वारकाधीश बनने के बाद भी कृष्ण ने निर्धन सुदामा को दौड़कर गले लगाया और उनके चरण धोए। मटकी के प्रसंग से उन्होंने समझाया कि कृष्ण जीवन का वजन बढ़ाने नहीं, बल्कि घटाने आए थे और यह वजन कर्मों का है। जीवन की सार्थकता बाहरी उपलब्धियों का भार बढ़ाने में नहीं, बल्कि कर्मों का भार घटाने में है।
गुरुदेव ने अर्जुन के रथ के प्रसंग से कहा कि जिस प्रकार कृष्ण के रहते रथ सुरक्षित रहा, उसी प्रकार यदि जीवन की गाड़ी का चालक धर्म और परमात्मा के आदर्शों को बनाया जाए तो जीवन सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। उन्होंने कहा कि बचपन की सहजता कृष्ण से, युवा अवस्था की मर्यादा भगवान राम से और वृद्धावस्था का वैराग्य भगवान महावीर से सीखना चाहिए।
उन्होंने कृष्ण जन्माष्टमी केवल जन्मोत्सव मनाने का अवसर न रहे, बल्कि अपने भीतर की यात्रा प्रारंभ करने का संकल्प बने। हमें अपने भीतर के अज्ञान, मोह, राग-द्वेष और कर्मों के अंधकार को दूर कर आत्मज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ना है। कृष्ण के जीवन से यही प्रेरणा लें कि बंधन से मुक्ति की ओर और अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ना ही जीवन की सच्ची यात्रा है।