तपोमूर्ति, तप चक्रवर्ती, महा तपस्वी श्री विरागमुनि महाराज साहेबजी के जीवन की झलक….
संसारी नाम -श्री मनोजजी डाकलिया जन्म- मेरू तेरस संवत २०३३, सोमवार , दिनांक १७-०१-१९७७ जन्म स्थान -कोटा पिता -श्री गौतमचंदजी डाकलिया माता - श्रीमती ललिताजी डाकलिया भाई - श्री जितेंद्र डाकलिया पढ़ाई- एम कॉम व्यवसाय - कपड़े का पत्नी- सुश्राविका मोनिकाजी वर्तमान में साध्वी श्री विरतियशाश्रीजी पुत्र - भव्य वर्तमान में मुनि श्री भव्यमुनि पुत्री - कुमारी ख़ुशी वर्तमान में साध्वी श्री विनम्रयशाश्रीजी दीक्षा - वैशाख सुद २, संवत २०७० गुरूवार, दिनांक ०१-०५-२०१४ स्थान - पाली राजस्थान वडी दीक्षा-आषाढ वदि ९, संवत २०७०, शनिवार, दिनांक २१-०६-२०१४ स्थान- नवरंगपुर दादावाडी, अहमदाबाद गुरूदेव- प. पू. पंन्यास श्री कुशलमुनिजी म.सा. नामकरण- मुनि श्री विरागमुनि म सा https://youtu.be/pXyDZaD0lSQ अतित के झरोखे से…. पाली राजस्थान के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ था जिसमें पूरे परिवार ने दीक्षा ग्रहण कर संयमी बना हो। करोड़ों रुपए की अचल संपत्ति, सालाना सात करोड़ रुपए का कपड़े का व्यवसाय और भरा-पूरा परिवार छोड़कर संन्यास का निर्णय, वह भी महज ३६ वर्ष की उम्र में। यह निर्णय पाली निवासी मनोज डाकलिया ने लिया था एवं उनसे भी बड़ा निर्णय उनकी पैंतीस वर्षीय पत्नी का था, जिन्होंने सभी सुख-सुविधाएं छोड़कर संयम पथ पर जाने का फैसला किया था।यहां तक भी ठीक था, परंतु डाकलिया दंपती की दो संतानों ने भी माता-पिता की राह पर चल पड़ी। उस समय बेटा मात्र आठ वर्ष का और संसारी नाम भव्य, जैसा नाम वैसा ही निर्णय। और बेटी खुशी की उम्र बारह वर्ष वह भी ठीक अपने नाम की तरह खुशी से उस राह पर चल पड़ी थी, जो बड़े-बड़े संयमी लोगों के लिए सहज नहीं था। इस पूरे परिवार ने १ मई २०१४ के दिन दीक्षा ग्रहण कर संयमी बना। श्री मनोज डाकलिया ने दस वर्ष पूर्व अपने गुरु जयानंद महाराज की प्रेरणा से ही संयम पथ पर चलने का संकल्प ले लिया था। साल २००३ में प्रथम उपधान तप की आराधना पूज्य श्री जयानंद मुनिजी की निश्रा में पाली में की थी। इसके बाद वे अपना सांसारिक जीवन भले ही जीते रहे लेकिन लगातार दीक्षा की इच्छा प्रबल होती गई। द्वितीय उपधान वर्ष २०१३ में गच्छाधिपति श्री जिनमणिप्रभ सुरीश्वर जी म सा ( तत्कालीन उपाध्याय प्रवर ) की निश्रा में पालीताणा में किया था। परिजनों व परिचितों ने खूब समझाया, पर मन में एक ही लक्ष्य बस संयम की राह अपनाने का। उनके इस निर्णय में पुत्र भव्य सर्वप्रथम उत्साहित बने, फिर पत्नी मोनिका शामिल हुई, फिर बेटी। बचपन से ही घर में धर्म-कर्म का माहौल ही बना रहा। माताजी का भी धर्म के प्रति अटूट प्रेम रहा। गुजराती कटला पाली राजस्थान निवासी परिवार के छोटे भाई जितेंद्र अमेरिका मे एक कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है, सपरिवार अमेरिका में रहते है। एक अदभुत भविष्यवाणी श्री मनोजजी डाकलिया परिवार के गुरूदेव श्री जयानंद मुनि जी ने अपने देवलोक गमन के पन्द्रह दिनों पहले ही भविष्यवाणी की थी, कि तुम्हारा पुत्र आठ वर्ष का होने पर सपरिवार दीक्षा ले लोगे। पूज्य गुरुदेव का देवलोक गमन आसोज वदी ४, बुधवार,संवत २०६१, तारीख़ २१ सितम्बर २००५ में हो गया था। मनोजजी भरा-पूरा परिवार और करोड़ों की संपत्ति के मालिक थे। मूलत: ब्यावर के रहने वाले थे। ब्यावर में आज भी उनका पैतृक मकान है। वहां उनके परिजन रहते हैं। दीक्षा के पैंतीस वर्ष पूर्व व्यवसाय के लिए परिवार पाली में आकर बस गया था। यहां बड़े से मकान में रहे और बाजार में एक दुकान भी थी। दीक्षा की तारीख तय होने के पूर्व ही मनोजजी ने अपना कपड़े का धंधा बंद कर दिया था। वह अब केवल अपने परिवार के साथ प्रभु के ध्यान में एक-एक क्षण बिताते थे। शादी से पहले ही वे संयम पथ धारण करने का विचार बना चुके थे। लेकिन सगाई हो गई और फिर शादी। उनकी पत्नी भी सगाई के बाद से दीक्षा का निर्णय कर चुकी थी। लेकिन उस समय तक उन्हें योग्य गुरु नहीं मिले थे। इनका परिवार जैन संत जयानंद मुनि, साध्वी अनुभवश्री और हेमप्रभाश्री के आभारी रहे। जिनकी प्रेरणा से उन्होंने संयम पथ पर चलने का निर्णय लिया था। परंतु दीक्षा के पहेले ही गुरूदेव श्री जयानंद मुनि का कालधर्म हो गया था। उन्हीं के शिष्य परम पूज्य गणाधी़श पंन्यास प्रवर श्री विनयकुशलमुनि के चरणों में जीवन समर्पित कर मुमुक्षु मनोज से बने मुनि श्री विरागमुनि उनके संसारी सुपुत्र मुमुक्षु भव्य मुनि श्री भव्यमुनि बने, धर्मपत्नी मुमुक्षु रत्ना मोनिका से साध्वी श्री विरतियशाश्रीजी बने, संसारी सुपुत्री मुमुमुक्षु ख़ुशी से साध्वी श्री विनम्रयशाश्रीजी बने । पाली संघ ने बहुत ही उत्साहपूर्वक दीक्षा प्रसंग में चार चाँद लगाने मे कोई कसर नहीं छोड़ी थी। पाली नगर की पुण्य धरा पर मुमुक्षु मनोज-मोनिका, ख़ुशी, भव्य डाकलिया सकुटुम्ब परमेश्वरी प्रवज्या प्रसंग पर अष्टान्हिका जिन महोत्सव का आयोजन दिनांक २५ अप्रेल से लेकर ०२ मई २०१४ तक दीक्षा महोत्सव समिति, पाली -मारवाड़ ने किया था। पावन निश्रा परम पूज्य शासन प्रभावक प.पू. श्री जयानंद मुनिजी म.सा. के शिष्य रत्न प.पू.श्री कुशलमुनिजी म.सा. की निश्रा में संपन्न हुए। दीक्षा निमित्त अलग अलग कार्यक्रम इस प्रकार से हुए थे। प्रथम दिन दिनांक २५-०४-२०१४, शुक्रवार के दिन डोरा बंधन, रात्रि भक्ति का कार्यक्रम हुआ था। द्वितीय दिवस २६-०४-२०१४,शनिवार के दिन श्री पार्श्वनाथ पंच कल्याणक पूजा,भक्ति संध्या का आयोजन किया गया था। तृतीय दिवस २७-०४-२०१४ रविवार के दिन अरिहंत वंदनावाली, मातृ-पितृ वंदना- भावना आचार्य का आयोजन किया गया था। चतुर्थ दिवस २८-०४-२०१४, सोमवार के दिन श्री नवपद पूजा, श्री शत्रुंजयतीर्थ भावयात्रा, रात्रि भक्ति का आयोजन हुआ था। पंचम दिवस २९-०४-२०१४ , मंगलवार के दिन श्री संघ मिच्छामि दुक्कड़म का कार्यक्रम हुआ था। षष्टम् दिवस ३०-०४-२०१४, बुधवार के दिन वर्षीदान वरघोडा निकला, जो बहुत ही भव्य रहा तत्पश्चात् महेंदी, गाँव साँझी, मायरा एवं विदाई समारोह का आयोजन किया गया था। सप्तम दिवस १-०५-२०१४ गुरुवार बर्हत्थाल(वीरथाल) महाअभिनिष्क्रमण यात्रा, दीक्षा की मंगल विधि प्रारंभ हुआ था। अष्टमदिवस ०२-०५-२०१४ , शुक्रवार के दिन नूतन दिक्षार्थीयो का चतुर्विध श्री संघ सहित सांसारिक गृह आँगन में पगले हुए थे। सभी कार्यक्रम जयानंद भक्ति मंडप, अनुव्रत नगर, पाली में हुए थे। इन सभी कार्यक्रम में भक्ति करवाने हेतु भारत वर्ष से विभिन्न कलाकार पधारे थे, जिसमें मुख्य अनिल गेमावत, बाल कलाकार सौरभ डोशी, चेन्नाई, लवेश बुरड, संजयभाई भाऊ, मोहनजी गुलेच्छा चेन्नई आदि पधारे थे। वर्तमान - महा तपस्वी, तप चक्रवर्ती बनने तक की यात्रा… पूज्य गुरुदेव श्री विरागमुनि की तपस्या जीवन की झाँकी पूज्य श्री ने अपने संसारी जीवन से ही तपोमय बनाने की शुरुआत वर्ष २००३ से की थी। प्रथम उपधयान, दुसरा २०१३ मे उपधयान किया। विशेष तपस्या इस प्रकार से की जिसकी जानकारी नीचे निम्नलिखित हैं। वर्षीतप तीन बार १ उपवास पारणा २ उपवास पारणा ३ उपवास पारणा इस तरह से १६ उपवास तक लगातार करके पारणा किया मासक्षमण एक बार सिद्धी तप एक बार दस महीनों तक छठ के पारणे छठ किए जिसके प्रथम चरण में ६७ छठ और द्वितीय चरण में ३४ छठ के पारणे छठ किये। १० उपवास - एक बार ११ उपवास - एक बार अठाई - तीन बार वर्तमान में पूज्य श्री ने उग्र तप की शुरुआत पौष वद अष्टमी संवत 2023, रविवार तारीख़ 15-01-2023 से की थी। आज दिनांक 04 जुलाई 2023 से 171 दिनों पहले उपवास तप का प्रारंभ किया था, जो अभी निरंतर चालु है। अपने विशेष संकल्प के पूर्ण होने तक। आप की इस उग्र तपस्या को देखते हुए परम पूज्य खरतर गच्छाधिपति आचार्य श्री मणिप्रभसागरजी ने आप को “तप चक्रवर्ती “ के बिरूद्ध से अलंकृत किया। साथ में उन्होंने ने बताया कि संपूर्ण 1000 वर्षो की खरतरगच्छ की ज्ञात जानकारी में इतना दीर्घ तप पहले किसी ने नहीं किया है। तपस्या 171 उपवास का पारणा कल दिनांक 05-07-2023 बुधवार को बालाघाट शहर (मध्यप्रदेश) में प्रातः व्याख्यान पश्चात होगा। पारना किसके द्वारा होगा, इस आशय कि घोषणा गुरुदेव द्वारा भाग्यशालियो के त्याग-तप के आधार पर की जायेगी।