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"स्वतंत्रता, धर्म और हमारे कर्तव्य” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 14 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव सूरि सम्राट, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में 15 अगस्त के संदर्भ में स्वतंत्रता, धर्म, कर्तव्य एवं श्रद्धा से जुड़े विभिन्न प्रश्नों का सरल एवं प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत किया।

स्वतंत्रता के वास्तविक अर्थ पर प्रकाश डालते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल पराधीनता से मुक्त होना नहीं है। सच्ची स्वतंत्रता तब है, जब मनुष्य अपने भीतर के मोह, क्रोध, लोभ और अहंकार से भी स्वतंत्र हो। उन्होंने कहा कि स्वाधीनता प्राप्ति के संघर्ष में जैन समाज का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्वतंत्र भारत के निर्माण के बाद संविधान निर्माण में भी जैन समाज ने अपने विचार, सिद्धांत एवं योगदान के माध्यम से देश की लोकतांत्रिक एवं नैतिक चेतना को समृद्ध किया। आज हमारा कर्तव्य है कि हम देश के प्रति ईमानदार रहें, कानून का पालन करें, समाज में शांति बनाए रखें और अपने आचरण से राष्ट्र को मजबूत बनाएं।

प्रश्नोत्तर कार्यक्रम में लगभग 70-80 प्रश्न प्राप्त हुए। गुरुदेव श्री ने कहा कि ये केवल कागज पर लिखे प्रश्न नहीं हैं, बल्कि श्रद्धालुओं के अंतर की जिज्ञासा को प्रकट करते हैं। ये प्रश्न बताते हैं कि हम धर्म को जानना, समझना और अपने जीवन का कल्याण करना चाहते हैं।

एक प्रश्न था—“गुरुदेव, आपके फेवरेट भगवान कौन हैं?” गुरुदेव श्री ने कहा कि उन्होंने बचपन से पार्श्वनाथ परमात्मा को देखा है, लेकिन भगवान-भगवान में भेद कैसे किया जा सकता है? जैन धर्म में नाम की नहीं, गुणों की पूजा होती है। सभी तीर्थंकर पूजनीय हैं, लेकिन वर्तमान में हम परमात्मा महावीर के शासन में हैं। उन्होंने चतुर्विध संघ की स्थापना कर हमें मोक्ष का मार्ग बताया।

साधु-साध्वियों की आचार-मर्यादा से जुड़े प्रश्न पर गुरुदेव श्री ने बताया कि उनकी आचार-मर्यादा शास्त्रों में विस्तारपूर्वक निर्धारित है और उनका जीवन शास्त्रीय नियमों एवं मर्यादाओं के अनुरूप चलता है। फोटो की पूजा से जुड़े प्रश्न पर उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर में हम केवल मूर्ति की नहीं, बल्कि प्राण-प्रतिष्ठित परमात्मा की पूजा करते हैं। फोटो दर्शनीय है, पूजनीय नहीं।

गुरु भगवंत के घरों में पगलिए करवाने के विषय में उन्होंने कहा कि गुरु भगवंत के पगलिए करवाने का अर्थ केवल घर को पवित्र करना नहीं है, बल्कि उनके पगलिए के बाद उस घर के वातावरण को भी धर्ममय बनाना है।

चढ़ावे के निमित्त पूछे गए प्रश्न पर गुरुदेव श्री ने कहा कि धन परमात्मा ने नहीं, पुण्य ने दिया है। इसलिए धर्म में लगाया गया धन घटता नहीं, बल्कि पुण्य बनकर लौटता है। उन्होंने कहा कि संसार की बैंक कभी भी फेल हो सकती है, लेकिन धर्म की बैंक में जमा किया हुआ पुण्य ब्याज, दर-ब्याज और चक्रवृद्धि ब्याज सहित मिलता है।

मंदिर, स्कूल और अस्पताल के संबंध में गुरुदेव श्री ने कहा कि तीनों की अपनी-अपनी उपयोगिता है। मंदिर हमारी संस्कृति और धर्म की पहचान हैं, स्कूल ज्ञान प्रदान करते हैं और अस्पताल सेवा का माध्यम हैं। समाज को इन सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ना चाहिए।

गुरुदेव श्री ने जानकारी दी कि 15 अगस्त को प्रवचन के पश्चात् दादावाड़ी में विराजमान होने वाले परमात्मा महावीर स्वामी, गणधर गौतम स्वामी, आचार्य जिनेश्वरसूरी, सरस्वती देवी एवं परमात्मा पार्श्वनाथ के चरणों के भराने के चढ़ावे बोले जाएंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि भराना अर्थात प्रतिमा को पूजनीय बनाने का विधान है तथा भराने वालों के नाम प्रतिमा पर अंकित किए जाएंगे। वहीं बिराजमान के चढ़ावे प्रतिष्ठा के शुभ मुहूर्त पर अलग से बोले जाएंगे।

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