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दशलक्षण पर्व शाश्वत, सार्वजनिक तथा सार्वभौमिक है क्योंकि यह पर्व आत्मा की शुद्धि का पर्व है, इसलिए इसे महापर्व कहते हैं।

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रायपुर - दुनिया में जितने भी पर्व हैं, उन सभी का किसी न किसी घटना अथवा महापुरुष से संबंध है, लेकिन दशलक्षण पर्व का संबंध किसी घटना अथवा महापुरुष से नही है। देश-काल, क्षेत्र विशेष, जाति-धर्म से भी इसका कोई संबंध नही है। यह पर्व तो शाश्वत, सार्वजनिक तथा सार्वभौमिक है क्योंकि यह पर्व आत्मा की शुद्धि का पर्व है, इसलिए इसे महापर्व कहते हैं। यह पर्व तो सभी पर्वों का सम्राट माना जाता है। सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में इसका उल्लेख मिलता है। यह जैनों का सबसे पवित्र पर्व है।  दिगम्बर सम्प्रदाय में यह पर्व प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पचंमी से चतुर्दशी तक मनाया जाता है। इन दिनों में जैन मंदिरों में खूब आनंद छाया रहता है। प्रतिदिन प्रातः काल से ही सब धर्मावलम्बी मंदिरों में पहुँच जाते हैं और बड़े आनंद के साथ भगवान का पूजन करते हैं।

 दशलक्षण महापर्व के दस दिनों में क्रमशः उत्तम क्षमा, उत्तम मार्दव, उत्तम आर्जव, उत्तम शौच, उत्तम सत्य, उत्तम संयम, उत्तम तप, उत्तम त्याग, उत्तम आकिंचन तथा उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना की जाती है। इन दस धर्मों के कारण इस पर्व को दशलक्षण पर्व कहते हैं, क्योंकि धर्म के उक्त दस लक्षणों का इस पर्व में खासतौर से आराधन किया जाता है। ये सभी आत्मा के धर्म हैं, क्योंकि इनका सीधा सम्बंध आत्मा के कोमल परिणामों से हैं। इस पर्व का एक वैशिष्ट्य है कि इसका सम्बंध किसी व्यक्ति विशेष से न होकर आत्मा के गुणों से है। इसप्रकार यह गुणों की आराधना का पर्व है। इन गुणों से एक भी गुण की परिपूर्णता हो जाय तो मोक्ष तत्व की उपलब्धि होने में किंचित भी संदेह नहीं रह जाता है।

एक बात और खास है कि इस सभी के साथ उत्तम शब्द जरूर जुडा होता है। यानि ये सब लक्षण उत्तम ही होने चाहिए। उत्तम क्षमा में बताया  गया है कि क्रोध प्रत्येक जीव का सबसे बडा शत्रु है, उसे जीतना ही उत्तम क्षमा है। उसी तरह किसी भी प्रकार के मान -अभिमान को समाप्त करने को उत्तम मार्दव धर्म की आराधना कहते हैं तथा अपने हृदय को मायाचारी से बचाकर सरल बनाने को ही उत्तम आर्जव धर्म की आराधना कहते हैं। इसी क्रम में लोभ को त्याग कर जीवन में शुचिता यानि पवित्रता को अपनाना ही उत्तम शौच धर्म की आराधना है, सभी के लिए हित, मित व प्रिय वचन बोलना ही उत्तम सत्य धर्म की आराधना है, अपनी आत्मा के विकारी भावों को नष्ट करना ही उत्तम संयम धर्म की आराधना है। उत्तम तप धर्म आराधना का मतलब है इच्छाओं का निषेध कर रागादि भावों को जीतकर अपने आत्मस्वरूप में लीन होना तथा

पर द्रव्यों से मोह छोडकर उनका त्याग करना ही उत्तम त्याग धर्म की आराधना है। नौवा धर्म है उत्तम आकिंचन धर्म जिसमें मेरी आत्मा के सिवाय किंचित मात्र भी पर पदार्थ मेरा नही है, ऐसा चिंतन करना ही उत्तम आकिंचन धर्म की आराधना है और अपनी आत्मा में रमण करना ही उत्तम ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना है।

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