रायपुर - पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर पांचवे दिन उत्तम सत्य धर्म की आराधना की गई। श्री दिगम्बर जैन खंडेलवाल मंदिर जी, सन्मति नगर, फाफाडीह, रायपुर में प्रातःकाल भक्तों ने मंदिर जी इन्द्रों की वेशभूषा में अभिषेक शांतिधारा से लेकर पर्व पूजाएं कर धर्मलाभ लिया।
आज उत्तम सत्य धर्म के दिन श्री महावीर स्वामी के समक्ष मूल वेदी में शांतिधारा का सौभाग्य श्री कमल कुमार जी निखिल अखिल चैतन्य काला परिवार को प्राप्त हुआ ।
समिति के अध्यक्ष अरविंद बडजात्या ने बताया कि पंचम दिवस प्रथम तल में भगवान पार्श्वनाथ की वेदी पर शांतिधारा का सौभाग्य श्री धर्मचंद जी मनीष कुमार आलोक बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। भगवान मुनिसुव्रतनाथ की वेदी पर शांतिधारा श्री पारसमल जी अनिल बाकलीवाल द्वारा की गई ।
संध्या समय श्रीमती उषा लोहाड़िया एवं श्रीमती वर्षा सेठी के निर्देशन में आवक प्रतिक्रमण कराया जा रहा है। साथ ही श्रावकों को णमोकार मंत्र के माध्यम से अपना सुरक्षा कवच बनाना भी सिखाया गया ।
पूर्व संध्या पर आयोजित शास्त्र सभा में स्थानीय विद्वान पं. नितिन जैन 'निमित्त' ने बताया - किसी भी वस्तु का महत्व उसकी सुंदरता, भव्यता या विशालता से नहीं होता। किसी भी वस्तु की महत्ता का आधार उसकी पवित्रता है। इसलिए मंदिर का महत्व है क्योंकि वह पवित्र है। मंदिर में जाने याला प्रत्येक भक्त इसलिए प्रसन्न होता है क्योंकि पवित्रता प्रसन्नता की जननी है। ज्ञानियों ने मानव मन को मंदिर की उपमा दी है। जीवन की पवित्रता किन दशाओं में खंडित होती है इसे जानना जरुरी है। पवित्र उसे कहते हैं जिसको छूने से छूने वाला भी पवित्र हो जाए। हम स्वच्छताप्रिय लोग हैं इसलिए हमारी शैली घर को साफ रखने के साथ-साथ आँगन को भी साफ रखने की है। क्योंकि आँगन यदि साफ नहीं होगा तो घर अधिक लम्बे समय तक साफ नहीं रह सकता। वैसे ही घर का रसोईघर भी साफ होना जरूरी है। वरना घर और आँगन को गंदा होने में समय नहीं लगेगा। अतः घर की सफाई के साथ-साथ रसोईघर, ड्राइंग रूम और आँगन की सफाई भी जरूरी है। वैसे ही हमारे जीवन का आँगन है व्यवहार, ड्राइंग रूम है हमारी वाणी और रसोईघर है हमारा अतःकरण। इन तीनों की पवित्रता ही जीवन मंदिर की पवित्रता है। मन, वचन, काय की पवित्रता अधिकाधिक समय के लिए टिकी रही तब उत्तम पवित्रता घटित होती है। उत्तम पवित्रता निश्चित ही व्यक्ति को प्रसन्नता देती है।
और उत्तम पवित्रता का नाम ही उत्तम शौच है।
शौच का विपरीत लोभ है। लोभ पाप का बाप कहलाता है। लोभ मनुष्य का सत्यानाश कर देता है। लोभ के वशीभूत होकर मनुष्य अपने सगे सम्बंधियों से भी दगा कर जाता है। लोभ के वश में आकर कौरवों ने राज्य तो गंवाया ही साथ ही समूल नष्ट हो गए। लोभ के कारण ही भरत चक्रवर्ती ने अपने भ्राता बाहुबली पर चक्र चला दिया था।
तन की भूख तनिक है, एक पाव या सेर
मन की भूख अपार है, चाहे मिले सुमेर ।।
वर्तमान काल में प्राणी लोभ के वश में होकर के सारे कार्य कर रहा है। 1 दिन मिलने वाले लाभ के इंतजार में अपने पिछले 30 दिन गंवा बैठता है। सब का लालच छोड़कर ही परमपद को पाया जा सकता है यानि शून्य में विलीन हुआ जा सकता है। अनादि यानि शून्य में विलीन होने की कला भारतीय संस्कृति में ही है।
लोभ का त्याग होगा तभी कषायों का त्याग हो पाएगा, शौच धर्म अपने आप अन्य धर्मों की प्रगाढता का कारण बनेगा।
- अरविंद बडजात्या ::