बिलासपुर - जैनों का महापर्व दशलक्षण महापर्व समूचे विश्व में बड़े ही श्रद्धा भाव के साथ मनाया जा रहा है तो फिर संस्कारधानी बिलासपुर कैसे पीछे रह सकती है। बिलासपुर स्थित तीनों जिन मंदिरों में प्रतिदिन सुबह से जैन श्रावक पूरे भक्तिभाव के साथ पूजा अर्चना कर रहे हैं। इस महापर्व के पांचवें दिन मंदिरों में उत्तम सत्य धर्म की पूजा की गई। क्रांतिनगर मंदिर में प्रथम शांतिधारा करने का सौभाग्य ताराचंद वीर कुमार, जय कुमार अमित जैन, अनिल चेतन चौधरी, सुनील जैन, विजय जैन, अमित जैन एवं उनके परिवार जनों को प्राप्त हुआ। सरकण्डा मंदिर जी में यह सौभाग्य प्रभाष जैन, आर. के. जैन, राजेश जैन, धन्य कुमार जैन, अजय जैन, अंशुल जैन, मनीष जैन, दिनेश जैन एवं उनके परिवारजनों को मिला। सन्मति विहार जिनालय में यह सौभाग्य हेमंत जैन, सत्येंद्र जैन एवं उनके परिवार को प्राप्त हुआ।
उत्तम सत्य धर्म के दिन उत्तम धर्म पूजा के पंक्तियों की व्याख्या करते हुए पंडिन जयदीप शास्त्री जी ने बताया कि जहाँ क्षमा, मार्दव, आर्जव और शौच आत्मा का स्वभाव है, वहीं सत्य, संयम, तप, त्याग इन गुणों को प्रगट करने के उपाय हैं, या कहें कि ये वो साधन हैं जिनसे हम आत्मिक गुणों की अनुभूति और प्रकट कर सकते हैं। उन्होंने बताया कि जैन दर्शन में सत्य का अर्थ मात्र ज्यों का त्यों बोलने से नहीं है, बल्कि हित-मित-प्रिय वचन बोलने से है। हितकारी वचन यानि जिसमें जीव मात्र की भलाई हो, कहने का अभिप्राय ये है कि जिन वचनों से यदि किसी जीव का अहित होता हो तो वे वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही है। मित यानि मीठा बोलो अर्थात् कड़वे वचन, तीखे वचन, व्यंग्य परक वचन, परनिंदा, पीड़ाकारक वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही माने गये हैं। प्रिय वचन यानि जो सुनने में भी अच्छे लगे, ऐसे वचन ही सत्य वचन हैं। उसी प्रकार अगली पंक्ति “अनगार धर्मामृत” के अनुसार जो वचन प्रशस्त, कल्याणकारक तथा सुनने वाले को आह्लाद उत्पन्न करने वाले, उपकारी हों ऐसे वचनों को ही सत्यव्रतियों ने सत्य कहा है। किन्तु उस सत्य को सत्य न समझना जो अप्रिय और अहितकर हो।
जिन वचनों से जीवों की विराधना हो, हिंसा संभव हो ऐसे वचन सत्य होते हुये भी असत्य ही हैं, कभी झूठ नहीं बोलना चाहिये। इस बात का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि जैसे राजा वसु सत्यधर्म का धारक होने से सर्वत्र धर्मराज के रूप में प्रतिष्ठित था, पर फिर किसी कारणवश ही सही, झूठ बोलते ही नरक गति का पात्र बना, और वहीं दूसरी और नारद सत्य बोलने से स्वर्ग का पात्र बना, इसलिये कहते हैं कि बोलने से पहले विचार अवश्य करना चाहिये, यदि वसु राजा झूठ बोलने से पहले एक बार विचार करता तो आज वह जीव नरक में नहीं होता।
आगे उन्होंने बोला कि बोलना एक सुंदर कला है परन्तु मौन रहना उससे भी श्रेष्ठ। ऐसे सत्य वचनों को समझे बिना जीव का कल्याण संभव नहीं है। सत्यवादी की ही सर्वत्र प्रतिष्ठा होती है, वही सुखी है। नम्रता और प्रिय संभाषण ही मनुष्य के आभूषण माने गये हैं, वरना आँख, नाक, कान तो जानवरों के भी होते हैं, खाना पानी, काम-भोगादि तो पुण्य की अनुकूलता से जानवरों को भी प्राप्त हो जाते हैं, एक वाणी ही अनमोल है जो तिर्यंचो को प्राप्त नहीं होती। वाणी ही तो है जो मनुष्य की सभ्यता और असभ्यता की पहचान कराती है। जिसकी वाणी खराब उसका ये अमूल्य मनुष्य भव भी बेकार है, क्योंकि जो कार्य एक हथियार नही कर सकता वो वाणी कर सकती है। वाणी मनुष्य को घायल भी कर सकती है और मरहम भी लगा सकती है। असत्य वचन बोलने से अपयश, अरति, कलह, बैर, बध, बंधन, मरण, जिव्हाछेद, व्रत शील संयमादि का नाश, नरकादि दुर्गतियों में गमन, घोर पाप का आस्रव आदि हजारों दोष प्रगट होते हैं। जबकि सत्य वचन दया धर्म का मूल है, अनेक दोषों को दूर करने वाला है, या यों कहिये सत्य धर्म संसार सागर से पार उतारने में जहाज के समान है। सत्यवादी की देवता भी सहायता करते हैं, इसलिए सभी सत्य धर्म को धारण करो, क्योंकि हित-मित-प्रिय सत्य वचन बोलने वाला जीव संसार में परिभ्रमण नहीं करता है। मनुष्य अनेक कारणों से असत्य बोला करता है, उनमें से एक तो झूठ बोलने का प्रधान कारण लोभ है। लोभ में आकर मनुष्य अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिये असत्य बोला करता है। असत्य भाषण करने का दूसरा कारण भय है। मनुष्य को सत्य बोलने से जब अपने ऊपर कोई आपत्ति आती हुई दिखाई देती है, अथवा अपनी कोई हानि होती दिखती है। उस समय वह डरकर झूठ बोल देता है, झूठ बोलकर वह उस विपत्ति या हानि से बचने का प्रयत्न करता है। आज झूठ का बोलबाला होने से मनुष्य दुखी होकर अनेकों परेशानियों का सामना करता हैं .सत्य एक होता हैं झूठ कई तरह से बोलकर मनुष्य अपने जाल में फंस जाता हैं।
धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों की कड़ी में दिगंबर जैन सोशल ग्रुप द्वारा स्मार्ट कैप्टन प्रका आयोजन किया गया। यह एक परिवारिक प्रतियोगिता थी, इसमें परिवार की महिला को कप्तान बनाया गया, साथ में टीम में उनके पति और सास को रखा गया। श्रेष्ठ कप्तान का चयन करने के लिए प्रतियोगिता को पांच चरणों में बांटा गया। पहले चरण में सवाल रसोई की बगिया से पूछे गए, द्वितीय चरण में एक वीडियो क्लिप दिखा कर उससे संबंधित प्रश्न पूछे गए, तीसरे चरण मेरे हमसफर में पति और पत्नी के बीच एक मनोरंजक खेल खेला गया जिसमें पति द्वारा अभिनय किया गया और पत्नी को उनके हाव भाव से फिल्म या मुहावरे को पहचानना था। चौथे चरण में कप्तान और टीम से किसी दूसरे की पारिवारिक समस्या का संमाधन पूछा गया, पांचवें और अंतिम चरण में धार्मिक और सामान्य ज्ञान के सवाल पूछे गए। स्मार्ट कप्तान का ताज प्रिय गौरव जैन को प्राप्त हुआ, द्वितीय स्थान पर मोना अंशुल जैन रही। अन्य प्रतियोगियों में पुनीत एकता जैन, स्वाति सुनील जैन और रचिता संजय जैन शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन संदीप जैन ने किया और उनका सहयोग समीर और अंशुल जैन ने दिया।