रायपुर - श्री दिगम्बर जैन खंडेलवाल मंदिर जी, सन्मति नगर, फाफाडीह, रायपुर में पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर सप्तम दिवस उत्तम तप धर्म की आराधना की गई। प्रातःकाल भक्तों ने मंदिर जी में इन्द्रों की वेशभूषा में अभिषेक शांतिधारा से लेकर पर्व पूजाएं कर धर्मलाभ लिया।
आज उत्तम तप धर्म के दिन श्री महावीर स्वामी के समक्ष मूल वेदी में शांतिधारा का सौभाग्य श्री हेमंत कुमार जी निलेश कुमार जी गर्वित कासलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
समिति के अध्यक्ष अरविंद बडजात्या ने बताया कि सप्तम दिवस में प्रथम तल में भगवान पार्श्वनाथ की वेदी पर शांतिधारा का सौभाग्य श्री चम्पालाल जी मनोज कुमार जी जैन को प्राप्त हुआ। भगवान मुनिसुव्रतनाथ की वेदी पर शांतिधारा महावीर प्रसाद जी राजकुमार जी बाकलीवाल परिवार द्वारा की गई।
प्रतिदिन के अनुसार संध्या समय श्रीमती उषा लोहाड़िया एवं श्रीमती वर्षा सेठी के निर्देशन में श्रावक प्रतिक्रमण कराया गया।
शास्त्र सभा में स्थानीय विद्वान पं. नितिन जैन 'निमित्त' ने बताया, सम्यक यमो वा संयमः सम्यक् प्रकार से क्रिया, यम या पुरुषार्थ किया जाए वो संयम है। कलकल बहती नदी भी किनारों के संयम में बंधकर बहती है। घर में माता पिता का अनुशासन संयम है तो मंदिर में आगम निर्धारित नियम ही संयम हैं। सामाजिक जीवन में परंपराओं का व्यवस्थित रूप पालन भी संयम का ही एक प्रकार है। असंयत जीवन बिना ब्रेक की कार के समान होता है। असंयत आत्मा के लिये योग की उपलब्धि असंभव है। मन और इंदियां मनुश्य की दो मौलिक शक्तियां हैं। पूरे प्राणी जगत में जितना सक्षम मन और इंद्रिय मनुष्य को प्राप्त हैं उत्तनी संसार के किसी भी प्राणी को नहीं हैं। इनका सदुपयोग करके हम जीवन का परम विकास कर सकते हैं। ये हमें सेवक के रूप में प्राप्त हुई हैं, पर हम इनके दास बने हुए हैं। मन और इंद्रियों पर हमारा नियंत्रण नहीं है।
इंद्रिय विषयों के प्रति आसक्ति हमारी आत्मा को भटकाती है। मन की प्यास अनन्त है इसे कोई शांत नहीं कर सकता। कोई भी इंद्रिय विषय मनुष्य को स्थाई सुख नहीं दे सकते । इन इंदियों पर विजय पाना आवश्यक है। इंद्रिय विजय का अर्थ इंद्रियों को नष्ट करना नहीं है बल्कि विषयों की ओर भटक रही बहिर्मुखी इन्द्रियों को अपनी ओर मोड़कर अपनी सेविका बनाकर उनका सदुपयोग करना है।
जीवन एक रथ है जिसमें इंद्रिय रूपी घोड़े जुते हुए हैं। ये घोड़े राग और द्वेष से प्रेरित होकर जीवन रथ को पतन की ओर ले जाते हैं। अतः मन की लगाम को मजबूत करना आवश्यक है।
बोलो कम सुनो अधिक ये है परम विवेक ।
इसीलिये विधि ने दिये दोय कान मुख एक।।
: अरविंद बड़जात्या