रायपुर - श्री दिगम्बर जैन खंडेलवाल मंदिर जी, सन्मति नगर, फाफाडीह, रायपुर में पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर अष्टम दिवस उत्तम त्याग धर्म की आराधना की गई। प्रातःकाल भक्तों ने मंदिर जी में इन्द्रों की वेशभूषा में अभिषेक शांतिधारा से लेकर पर्व पूजाएं कर धर्मलाभ लिया।
आज उत्तम त्याग धर्म के दिन श्री महावीर स्वामी के समक्ष मूल वेदी में शांतिधारा का सौभाग्य श्री महावीर प्रसाद जी राजकुमार जी जितेन्द्र जी राकेश जी नरेन्द्र जी बाकलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ।
समिति के अध्यक्ष अरविंद बडजात्या ने बताया कि अष्टम दिवस में प्रथम तल में भगवान पार्श्वनाथ की वेदी पर शांतिधारा का सौभाग्य श्री विजय कुमार जी अनिल कुमार जी जैन, कुरावाले परिवार को प्राप्त हुआ। भगवान मुनिसुव्रतनाथ की वेदी पर शांतिधारा श्रीमती देउबाई जी गोधा, संजय जी विनय जी गोधा परिवार द्वारा की गई । प्रतिदिन के अनुसार संध्या समय श्रीमती उषा लोहाडिया एवं श्रीमती वर्षा सेठी के निर्देशन में श्रावक प्रतिक्रमण कराया गया।
शास्त्र सभा में स्थानीय विद्वान पं. नितिन जैन 'निमित्त' ने बताया हमारा जीवन इच्छाओं का अक्षय पात्र है। इच्छाओं का निरोध करना तप है। प्रत्येक व्यक्ति में भगवान बनने की शक्ति है।
पाषाणेषु यथा हेमः, दुग्ध मध्ये यथा घृतः, तिल मध्ये यथा तैलं, देह मध्ये तथा शिवः।।
जैसे पाषाण में स्वर्ण है, दुग्ध में घी विद्यमान है, तिल के भीतर तेल उपस्थित है वैसे ही प्रत्येक मनुष्य में भगवान बनने का सामर्थ्य है। प्रत्येक प्राणी में अपार क्षमता है। सिर्फ अभिव्यक्ति का अवसर नहीं मिल रहा है। ये दशलक्षण पर्व आपको अपनी शक्ति की अभिव्यक्ति का अवसर देने आए हैं।
तन मिला तुम तप करो, करो कर्म का नाश । रवि शशि से भी अधिक है, तुममें दिव्य प्रकाश।।
समाज के कई सुधी श्रावक एकासन, उपवास आदि कर रहे हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं जिन्होंने शायद पहली बार उपवास किया है। इसके पूर्व उन्हें इस बात की अनुभूति नहीं थी कि वे ऐसा कर सकते हैं। परन्तु उनकी आत्मा ने दशलक्षण के अवसर पर अभिव्यक्ति का प्रयास किया जा कि निश्चित ही परमपद की ओर ले जाने वाला होगा । उपवास का अर्थ उप यानि पास, समीप और वास मतलब रहना, अपने आराध्य के समीप रहना सो उपवास। जिसके स्थिर नामकर्म का उदय और वीर्य अंतराय कर्म का क्षयोपशम हो वही व्यक्ति उपवास कर सकता है। इनकी अनुमोदना करनी चाहिये कि इंदिय निरोध का कितना बड़ा उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।
उत्तम तप का लक्ष्य कर्मक्षय और इच्छा निरोध है। अपनी इच्छाओं को सीमित करना भी इच्छा निरोध है। अधिक संपत्ति की चाह न होना, अधिक वस्त्रों का संग्रह न होना, भोजन के प्रति भी कम लालसा होना।
जो जीवन में कभी तपता नहीं वो कभी पकता नहीं। नाम ख्याति के लिय किया गया त्तप पतन की ओर ले जाता है। इसलिये उत्तम तप को धारण कर परमपद की प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ करना चाहिये । : अरविंद बड़जात्या ::