November 04, 2025


श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्रांतिनगर बिलासपुर में सिद्धचक्र महामंडल विधान।

प्रवचन में मधुर भैया ने विद्यासागर जी के वचनों का जिक्र करते हुए कहा था कि मोक्ष मार्ग बाहर कम और भीतर ज्यादा है।

बिलासपुर - जीवन में सिद्ध अवस्था को प्राप्त करना है तो हमें सिद्धों की आराधना करनी होगी। हमें जानना होगा वो कैसे सिद्ध परमेष्ठी बने हैं, उनका संसार से आवागमन कैसे छूट गया ? परम पद में पहुंचने के लिए उन्होंने क्या प्रयत्न किया ? क्या हम भी सिद्ध बन सकते हैं ? यह सब चिंतन जिसने कर लिया वह सिद्धत्व दशा को प्राप्त कर सकता है, इसीलिए सिद्धचक्र महामंडल विधान की आराधना की जाती है। यह बातें श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्रांतिनगर में सिद्धचक्र महामंडल विधान आराधना के दौरान धर्म सभा को संबोधित करते हुए विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया ने कहीं। दरअसल सिद्धचक्र महामंडल विधान के रूप में विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान श्री आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्रांतिनगर में ललितपुर से पधारे विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया द्वारा संपन्न कराया जा रहा है। जिसके तहत 8 दिन तक लगातार सिद्धों की आराधना के दौरान क्रमश 8, 16, 32, 64, 128, 256, 512 और 1024 अर्घ्य समर्पण किए जाते हैं। इसी क्रम में विधान के छठवें दिन 256 अर्घ्य विधानाचार्य भैय्या ने अर्पित करवाए। 

धार्मिक आयोजन के दौरान सुबह बड़ी संख्या में श्रद्धालु पूजा की सामग्री लेकर मंदिर पहुंचे। सर्व प्रथम उन्होंने श्रीजी का अभिषेक किया एवं शांतिधारा की, तदोपरांत पूजन एवं विधान प्रारम्भ हुआ और अर्घ्य चढ़ाए गए। विधान के बीच में टीकमगढ़ से आई राकेश संगीत मंडली ने आध्यात्मिक भजनों की प्रस्तुति कर वातावरण को पूरी तरह से भक्तिमय बना दिया। श्रद्धालुओं ने स्वर लहरियों के बीच नृत्य कर अपनी भक्ति भावना का परिचय दिया।

सांध्यकालीन प्रवचन में मधुर भैया ने संत शिरोमणि पूज्य गुरुवर विद्यासागर जी के वचनों का जिक्र करते हुए बताया कि संत शिरोमणि ने कहा था कि मोक्ष मार्ग बाहर कम और भीतर ज्यादा है। हमारी दृष्टि बाहर की तरफ रहती है जबकि अन्तर्दृष्टि की ओर जाने की जरूरत है। हम आगे देख सकते हैं परंतु पीछे नहीं देख सकते, ऊपर भी नहीं देख सकते हैं। व्यक्ति यहां वहाँ सब जगह दृष्टि दौड़ाता रहता है, जबकि अपनी आत्मा में लीन होना ही ब्रह्मचर्य है क्योंकि आत्मा को ब्रहम् कहा गया है।

 जिस प्रकार फोटो लगाने के लिए फ्रेम की जरूरत पड़ती है, उसी प्रकार जिनके पास अनंत गुण हैं, हम उसे नमस्कार करते हैं क्योंकि वो उपाधि एक तरह से फ्रेम होती है। चित्रकार जब चित्र बनाता है तो वह हर एक कोण का विशेष ध्यान रखता है, तब जाकर एक सुन्दर चित्र बनता है। आचार्य श्री ने कहा था कि अनंत को देखने का प्रयत्न करो, किसी भी चोखट के बिना, आप अपने अंतरंग का चित्र स्वयं बनाओ और अंतरंग में डूब कर बनाओ। जब सफ़ेद कागज पर सफ़ेद रंग से लिखा जाता है उसे समझने में दिक्कत होती है। आत्मा अक्षर रहित होती है जबकि आप अक्षर खोजते हो।


 चित्रकार कृष्ण के साथ हमेशा सफ़ेद गाय का चित्र बनाता है जबकि कृष्ण को सभी रंग की गाय पसंद थी। गाय सफ़ेद हो या काली दूध सफ़ेद ही देती है। कोण कैसा भी हो दृष्टिकोण स्पष्ट होना चाहिए और दृष्टिकोण में विशालता लाने की आवश्यकता है। दृष्टि को फ्रेम या चौखट तक सीमित न रखें अपितु केंद्रबिंदु तक ले जाएँ। 

उन्होंने कहा आज का विकास चित्र से विचित्र की ओर जा रहा है इसलिए दिशाहीन है। जब तक गहराई में उतरेंगे नहीं, जब तक ज्ञान में डूबेंगे नहीं और जब तक हीरे को चारों तरफ से अच्छे से देखेंगे नहीं तब तक उसकी सही पहचान नहीं कर पाएंगे। जब दर्शन करते हैं तो परमात्मा की प्रतिमा को दर्पण के प्रतिबिम्ब के माध्यम से अनेक रूप में देखते हैं ऐसे ही ज्ञान के प्रतिबिम्ब के माध्यम से आत्मा का स्वरुप भी विराट दिखाई देता है।


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