रायपुर - हैदराबाद के त्रयनगर स्थित श्री जैन श्वेताम्बर जिनकुशलसूरिजी दादाजी बाग मंदिर, कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 31 जुलाई 2026 को परम पूज्य गुरुदेव सूरि सम्राट, राष्ट्ररत्न, अवंती तीर्थोद्धारक, गुणायाजी तीर्थ जीर्णोद्धार प्रेरक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कहा कि मनुष्य दिनभर संसार से तो बहुत संवाद करता है, किन्तु स्वयं अपने मन से बात करने का समय शायद ही निकालता है। जबकि जीवन की सबसे बड़ी आवश्यकता यही है कि हम कुछ क्षण रुककर स्वयं से पूछें—मेरा मन कैसा है और मुझे अपना मन कैसा बनाना है?
गुरुदेव श्री ने कहा कि हमारा घर, दुकान, तिजोरी अथवा कमरा कभी खाली हो सकता है, किन्तु मन कभी खाली नहीं रहता। यदि उसमें अच्छे विचार नहीं बोए जाएँ, तो बुरे विचार स्वतः स्थान बना लेते हैं। जैसे खाली खेत में यदि अन्न न बोया जाए तो उसमें घास-फूस उग जाती है, उसी प्रकार रिक्त मन में नकारात्मकता अपना स्थान बना लेती है। इसलिए मन की नियमित जाँच, शुद्धि एवं सकारात्मक संस्कार अत्यंत आवश्यक हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन का प्रत्येक निर्णय मन से ही निकलता है। हम कहाँ जाएँगे, क्या बोलेंगे और किस प्रकार व्यवहार करेंगे, यह सब मन की स्थिति पर निर्भर करता है। इसलिए मन को ईर्ष्या, क्रोध और लोभ से नहीं, बल्कि क्षमा, करुणा, संतोष एवं सद्विचारों से सजाना चाहिए।
गुरुदेव श्री ने जैन परंपरा के प्रसन्नचंद्र राजर्षि का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि कुछ क्षणों के अशुभ विचार उन्हें अधोगति की ओर ले जाने लगे, किन्तु जैसे ही उन्हें आत्मस्मरण हुआ—“मैं साधु हूँ”, उनका दृष्टिकोण बदल गया और वही मन उन्हें आध्यात्मिक ऊँचाइयों तक ले गया। यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि मनुष्य का उत्थान और पतन किसी बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि उसके अपने विचारों से निर्धारित होता है।
उन्होंने आगे कहा कि आज का मनुष्य सदैव “इसके बाद क्या?” की दौड़ में लगा हुआ है। एक इच्छा पूरी होती है तो दूसरी सामने खड़ी हो जाती है। परिणामस्वरूप साधन बढ़ते जाते हैं, किन्तु संतोष नहीं बढ़ता। वास्तविक सुख बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि अपने मन को संतुलित, संयमित एवं संतुष्ट बनाने में है।
गुरुदेव श्री ने समापन करते हुए प्रेरणा दी कि यदि हम प्रतिदिन कुछ समय अपने मन से संवाद करें, अपने विचारों का निरीक्षण करें और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने का संकल्प लें, तो जीवन की दिशा बदल सकती है। मन को जीत लेना ही सबसे बड़ी विजय है और यही आत्मकल्याण का सच्चा मार्ग है।