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खुद को सुधारने का प्रयास ही धर्म है : - ऋषभ सागर

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बालोद - खुद को सुधारने का प्रयास ही धर्म है। धर्म वही कर सकता है जिसमें धारण करने का भाव हो। अपने अंदर के दोषों को पहचानने और उसे दूर करने का प्रयास किया जाना चाहिए। अरिहंत भगवानों की वाणी को गणधरों ने आगम के रूप में जैन धर्म ग्रंथ के रूप में उल्लेखित किया है। इनके श्रवण मात्र से हृदय में निर्मलता उदारता, तप, त्याग जैसी भावनाएं उभर कर आती है।

महावीर भवन में चल रहे प्रवचन श्रृंखला में संत ऋषभ सागर आगम के अंतगड सूत्र का वाचन कर उसके सार को कथा रूप में व्यक्त कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होनी चाहिए। इस ग्रंथ के माध्यम से जब हम वीर वाणी का श्रवण करते हैं तो हमें भी अपने लक्ष्य का स्मरण आता है ।जिस तरह आईना में धूल लगी हो तो अश्क साफ दिखाई नहीं देता उसी तरह कर्मों की धूल हमारी आत्मा में लगी है जो हमें दिखाई नहीं देती। किंतु धर्म ग्रंथो के श्रवण कर आत्मा की धूल को साफ करने और आत्मा को निर्मल बनाने का यह एक अवसर हमें प्राप्त होता है। अपने अंदर के दोषों को देखने एवं उसे दूर करने का यह एक अवसर है। जिसे अपने अंदर के दोषसमझ में आता है वह उसे सुधारने का प्रयास करता है। जिस तरह कपड़े का दाग हम साबुन से साफ करने का प्रयास करते हैं उसी तरह आत्मा के दाग को साफ करने के लिए तप, आराधना, साधना एवम व्रत आदि माध्यम बनता है। अक्षय निधि तप एवं विजय कषाय तप के माध्यम से अपने दोषों को दूर करने एवं गुणों को धारण करने का उपक्रम किया जाता है।जो लोग ये तप कर रहे हैं वे अनुमोदनीय हैं।दोषरहित जीवन  ही सार्थक और स्मरणीय होता है। जन्म तो सभी का एक जैसा ही होता है लेकिन मृत्यु कैसी हो यह महत्वपूर्ण होता है।

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