रायपुर - आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 के अंतर्गत दादाबाड़ी में अध्यात्म सार ग्रंथ का पठन करते हुए प्रवचन प्रभाविका साध्वी मंजुलाश्रीजी म.सा. ने शुक्रवार को अलग-अलग प्रसंगों के माध्यम से जीवन के उद्देश्य, आत्मचिंतन, समय का सदुपयोग, संयम, समर्पण, कृतज्ञता, विवेक, अनुशासन और मोक्षमार्ग पर विस्तार से मार्गदर्शन दिया। उनके प्रवचनों का मूल संदेश यही रहा कि मनुष्य को संसार की उलझनों में स्वयं को भूलने के बजाय अपनी आत्मा को पहचानने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का प्रयास करना चाहिए।
साध्वीश्री ने कहा कि जीवन में हमारा लक्ष्य निर्धारित होना चाहिए। मनुष्य जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष प्राप्त करना है और इसके लिए संसार के प्रति मोह, राग और द्वेष का त्याग करना आवश्यक है। केवल मोक्ष की इच्छा करना पर्याप्त नहीं, बल्कि त्याग, संयम और साधना के लिए पुरुषार्थ करना जरूरी है। स्वयं को समझना मोक्ष की दिशा में पहला कदम है।
उन्होंने समय की महत्ता बताते हुए कहा कि समय किसी के लिए रुकता नहीं। लोग अपने भविष्य की प्लानिंग तो करते हैं, लेकिन अपने जीवन को धर्म और आत्मकल्याण की दिशा में ले जाने की योजना नहीं बनाते। हमें व्यर्थ के चिंतन में अपना समय नहीं गंवाना चाहिए। जिस विषय पर चिंतन करना जरूरी है, उसी पर मन को केंद्रित करना चाहिए। अध्यात्म में रमने से चिंतन में व्यापकता आती है।
साध्वीश्री ने समर्पण को साधना का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि साधना में छटपटाहट और समर्पण का भाव होना चाहिए। अहंकार और समर्पण साथ नहीं चल सकते। हनुमानजी और माता सीता के सिंदूर के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि सच्चा समर्पण प्रभु के प्रति पूर्ण निष्ठा और अहंकार के त्याग से आता है।
उन्होंने कहा कि परिणाम अपने आप नहीं आते, हम अपने कर्मों और भावों से उन्हें बनाते हैं। इसलिए विषयों और इंद्रियों के प्रति अत्यधिक आसक्ति से बचना चाहिए। राजा और आम के प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संयम की आवश्यकता समझाई। इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखा गया तो व्यक्ति मोह में फंसकर अपना विवेक खो सकता है।
साध्वीश्री ने कृतज्ञता, विनय और माता-पिता के प्रति जिम्मेदारी पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चों को माता-पिता के बुढ़ापे में सहारे की लाठी बनना चाहिए, लाठी चलाने वाला नहीं। व्यक्ति को अपनी योग्यता बढ़ानी चाहिए, तिरस्कार को सहन करना सीखना चाहिए और सभी के व्यवहार का अवलोकन करते हुए अपने मौलिक गुणों को विकसित करना चाहिए।
उन्होंने अनुशासन को जीवन की सफलता का आधार बताते हुए कहा कि जीवन को कीमती बनाने के लिए पहले स्वयं अनुशासित होना जरूरी है। अपनी ताकत और योग्यता को सही समय पर पहचानना चाहिए। कार्य को टालने के बजाय समय रहते पूरा करना चाहिए, क्योंकि ‘अभी बहुत समय है’ सोचकर किया गया विलंब जीवन की बड़ी भूल बन सकता है।
साध्वीश्री ने मैत्री भाव, चिंतन और समभाव का महत्व बताते हुए कहा कि भले ही हमारी अपेक्षाएं पूरी हों या न हों, लेकिन हमारे द्वारा दूसरों की अपेक्षाएं पूरी हों, यही मैत्री भाव है। भूल हो जाए तो उसे तुरंत स्वीकार करना चाहिए। ‘मिच्छामी दुक्कड़म’ केवल शब्द नहीं, बल्कि अपनी भूल को अंत:करण से स्वीकार करने की भावना है।
उन्होंने कहा कि जीवन में धर्म, संयम, विवेक, कृतज्ञता और आत्मचिंतन को स्थान देकर ही वास्तविक सुख प्राप्त किया जा सकता है। बाहरी सुख की तलाश में संसार में उलझने के बजाय व्यक्ति को अपने भीतर झांकना चाहिए। आत्मा को भूलकर जीवन जीने के बजाय आत्मा के स्वरूप को समझना और अपने चिंतन को मोक्षमार्ग की ओर लगाना ही मनुष्य जीवन की सार्थकता है।
इस अवसर पर श्री ऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय कुमार भंसाली, ट्रस्टी नरेश बैद्मुथा, राजेंद्र गोलछा एवं उज्ज्वल झाबक तथा आत्म उत्क्रांति आध्यात्मिक चातुर्मास-2026 समिति के अध्यक्ष, महासचिव मुकेश निमाणी, सह-सचिव अभिषेक गोलछा एवं कोषाध्यक्ष चिंतन मालू सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।