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“अहंकार जीवन की प्रगति का सबसे बड़ा स्पीड ब्रेकर है” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद के त्रयनगर स्थित कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 6 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव अवंती तीर्थोद्धारक, खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कहा कि सड़क का स्पीड ब्रेकर बाहर से दिखाई देता है, किन्तु जीवन का स्पीड ब्रेकर बाहर से नहीं आता, उसका निर्माण मनुष्य स्वयं अपनी संकीर्ण सोच, गलत दृष्टिकोण और अहंकार से करता है। यदि व्यक्ति अपनी सोच को व्यापक बनाकर यथार्थ चिंतन को जीवन में उतार ले, तो जीवन के सभी स्पीड ब्रेकर समाप्त हो जाते हैं और विकास का मार्ग सहज हो जाता है।

गुरुदेव श्री ने कहा कि मनुष्य के विकास का सबसे बड़ा बाधक तत्व “मैं” और अहंकार है। यही अहंकार व्यक्ति की मुस्कान छीन लेता है, उसके भीतर ईर्ष्या, द्वेष और कटुता को जन्म देता है तथा परिवार, समाज, धर्म और राष्ट्रों तक के अनेक विवादों का मूल कारण बन जाता है। अहंकार सबसे पहले व्यक्ति की प्रगति को रोकता है और अपनों के बीच भी दूरियाँ पैदा कर देता है।


भगवान महावीर के पूर्वभव मरीचि का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि तीर्थंकर बनने का भविष्य ज्ञात होने पर उनके भीतर विनम्रता के स्थान पर “मैं तीर्थंकर हूँ” का भाव जागृत हुआ और वही अहंकार उनकी आध्यात्मिक प्रगति में सबसे बड़ा अवरोध बन गया। इसी प्रकार बाहुबली के जीवन का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हजारों वर्षों की कठोर तपस्या भी तब तक फलदायी नहीं बनी, जब तक अहंकार का गजराज समाप्त नहीं हुआ। जैसे ही उनके भीतर विनय और वंदना का भाव जागृत हुआ, उसी क्षण केवलज्ञान प्रकट हो गया।

आचार्य भगवंत श्री ने यशोविजयजी महाराज का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि सच्चा संत वही है, जो अपनी छोटी-से-छोटी भूल को भी सहजता से स्वीकार कर अहंकार का त्याग कर दे। उन्होंने कहा कि यदि जीवन में शांति, प्रसन्नता और आत्मविकास प्राप्त करना है, तो सबसे पहले अहंकार का चश्मा उतारकर यथार्थ दृष्टि अपनानी होगी। जब “मैं” समाप्त होता है, तभी विकास की राह बिना किसी स्पीड ब्रेकर के आगे बढ़ती है और आत्मा परम शांति की ओर अग्रसर होती है।

इस अवसर पर पूज्य मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म.सा. ने जानकारी देते हुए बताया कि अगले दिन के प्रवचन का विषय “सुंदर व्यवहार का निर्माण कैसे करें” रहेगा। उन्होंने सभी तपस्वियों की सुखशाता पूछते हुए अधिक से अधिक श्रद्धालुओं को तप एवं धर्माराधना से जुड़ने तथा प्रतिदिन गुरुदेव श्री के मंगल प्रवचन का लाभ लेने का आग्रह किया।

गुरुदेव श्री के प्रेरणादायी प्रवचन ने सभी को अहंकार का त्याग कर विनम्रता एवं यथार्थ दृष्टि के साथ आत्मविकास के मार्ग पर अग्रसर होने की प्रेरणा प्रदान की।

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