रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में रोजाना ज्ञान की गंगा बह रही है। सर्वमंगलमय वर्षावास की प्रवचनमाला में गुरुवार को परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. ने कहा कि जब तक मनुष्य का विवेक जागृत नहीं होगा और अज्ञान दूर नहीं होगा, तब तक आत्मकल्याण संभव नहीं है। अज्ञान में जीने वाला व्यक्ति केवल अपना ही नहीं, बल्कि अपने आसपास के लोगों का भी नुकसान करता है।
मुनिश्री ने कहा कि जिस प्रकार छत के बिना मकान अधूरा होता है, उसी तरह जीवन में विवेक और सही मार्गदर्शन के बिना व्यक्ति भटक जाता है। यदि किसी को यह ही पता न हो कि उसके जीवन में किस चीज का अभाव है, तो वह उसकी पूर्ति भी नहीं कर सकता। इसे समझाते हुए मुनिश्री ने दृष्टिहीन व्यक्ति का उदाहरण दिया और कहा कि सामने आग होने का आभास तो हो सकता है, लेकिन दिशा का ज्ञान न हो तो बचाव संभव नहीं है।
मुनिश्री ने कहा कि अपनी गलतियों को स्वीकार करना चाहिए। सुधार के लिए प्रायश्चित पहली सीढ़ी है। अज्ञान में रहने वाला जीव ज्ञान से द्वेष करने लगता है और उसके कार्य लगातार बिगड़ते चले जाते हैं। उन्होंने कहा कि क्षमता होने के बावजूद यदि व्यक्ति के पास सही दृष्टि नहीं है, तो वह स्वयं अपना नुकसान कर बैठता है।
मुनिश्री ने कहा कि दुख और दुर्गति से बचने के लिए अज्ञान छोड़कर सद्भाव और सद्ज्ञान से जुड़ना होगा। मनुष्य संसार की अनावश्यक उलझनों में फंसा रहता है और जिस सुख की तलाश में भटकता है, वह उसे कभी प्राप्त नहीं होता। इच्छाएं पूरी होने के बाद भी चिंता बनी रहती है। अज्ञान की प्रवृत्ति मनुष्य को देव, गुरु और धर्म से दूर कर देती है। तीव्र प्रायश्चित और पुरुषार्थ के बिना मोक्ष मार्ग की प्राप्ति संभव नहीं है।
मुनिश्री ने कहा कि केवल अध्ययन करने से कैवल्यज्ञान प्राप्त नहीं होता। ज्ञान का निरंतर पुनरावर्तन और जीवन में पुरुषार्थ आवश्यक है। उन्होंने कहा कि हमेशा नए चीजों का आकर्षण बना रहता है। ज्ञान के बिना आत्मा का विकास संभव नहीं है। गुरु के पास जाकर यदि जिज्ञासा नहीं करेंगे और शास्त्रों को समझने का प्रयास नहीं करेंगे, तो वह भी अज्ञान का ही रूप है।
समाचार प्रदाता - चातुर्मास समिति के तरुण कोचर