रेल्वे संघर्ष समिति के आंदोलनकारियों में विधानसभा चुनाव को लेकर सुगबुगाहट।
रामकुमार टंडन, कबीरधाम
कबीरधाम :- रेल्वे संघर्ष समिति की मांग केवल और केवल राजनीति भेंट चढ़ गयी है। कलतक जिन लोगों ने समिति के साथ काम आगे आकर काम किया है, आज वे ही हाथ पांव फुलाकर दूर भाग रहे हैं। वैसे भी आंदोलन पुरी तरह से गैरराजनितिक रहा है। सभी राजनितिक दल के कार्यकर्ता पदाधिकारी सदस्य है। सभी का समर्थन है। समय के साथ करवट बदलकर पीछे द्वार से भाग खड़ा होना पसंद कर रहे हैं। यूं कहें कोयले की आग में जलती हुई रेल की इंजन से दूर रहते हैं। भाजपा सरकार के बाद कांग्रेस की सरकार भी बहुत ज्यादा रेल्वे संघर्ष समिति पंडरिया को सहयोग नही करी है समिति और क्षेत्रीय जनता आज ठग्गा सा महसूस कर रही है।
क्षेत्रीय जनता की सपना रह गया अधूरा बर्षो पुरानी क्षेत्रीय जनता अंग्रेज हुकुम से समय से रेललाइन की सपना देख रही है, हर बार सर्वे देख मन में लड्डू फूटने लगाता था। छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के बाद से उम्मीद ज्याद बढ़ गयी थी, किन्तु सपना आज भी आजादी के 78 साल बाद अधूरा रह गया है।
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295 किलोमीटर रेल लाइन के लिए 6 हजार करोड़ रुपये की केंद्रीय बजट पास" केंद्रीय रेल बजट मंत्रालय ने राशि मंजूरी दी हुई है, किन्तु राजनेता जनता की के अनुरूप फैसला न कर राजनितिक लाभ लेने में अपनी सारी ऊर्जा ख़त्म कर अपना छाप छोड़ने में मशगूल हो गये हैं। और समिति की जायज मांग को कुचलने में लग गये, इधर विपक्षीय पार्टी 15 साल सत्ता से दूर हो परेशान हो गयी थी, क्षेत्रीय मुद्दा को पकड़कर रेल्वे संघर्ष समिति की मांग को सडक से राजभवन तक समर्थन देने लगी हवा की रुख भी बदलने लगी। राजनितिक दांवपेच भी अपनी सहभागिता निभानी शुरु कर दी। तत्कालीन सरकार आंदोलन की आवाज कुचलने रातों रात रुपरेख तैयार कर पूर्व केंद्रीय रेल मंत्री पीयूष गोयल के हाथों 6 अक्टूबर 2018 को अपने मनसूबे से बनाये हुए रेल लाइन पर जिले के लिए इतिहासिक फैसला बताकर भूमिपूजन छत्तीसगढ़ सरकार ने कर दिया। समिति आंदोलन करने दिल्ली तक जा पहुंची थी।
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पंडरिया से दिल्ली के जंतरमंतर पर धरना" पंडरिया रेल्वे संघर्ष समिति अपनी रेल रूट परिवर्तन की मांग को लेकर धरने में दिल्ली जनतन्त्रमतर पर जा बैठी, इस दौरान प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन कई मंत्रियों से भेंट मुलाक़ात कर अवगत कराया गया। फिर छत्तीसगढ़ राज्य विधानसभा चुनाव का घोषणा हो गया, आंदोलन छोड़कर नराज कार्यकर्ता और पदाधिकारी चुनाव में कूद पड़े।
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आंदोलन जिले के इतिहास में दर्ज" कबीरधाम जिले की इतिहास में पहली बार किसी संघठन ने अपनी मांग को लेकर आंदोलन करी है। रेल्वे संघर्ष समिति अपनी रूट परिवर्तन की मांग को लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक रखी थी। आंदोलन इतिहासिक 104 दिन चला था, जो लोगों मे आज भी याद है।
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सी.आर.सी.एल अफसर भी समय समय पर समिति को गुम राह करते रहे।" छत्तीसगढ़ राज्य रेलवे बोर्ड CRCL कार्यालय रायपुर के अफसर भी समय समय पर समिति के रुपरेख जानने के बाद राज्य सरकार को अवगत करती है। हालांकि कार्यालय के पास कोई अधिकार नही है। फिर भी राज्य में राज्य शासन के रेल्वे की मांग को लेकर खिलाफ होने वाले आंदोलन या प्रदर्शन की जानकारी देने काम करती रहती है। इसलिए उसे समिति ने गुमराह ऑफिस मान लिया है।
"आंदोलन में सभी राजनीति दल की सक्रिय भूमिका" रेल्वे की इस आंदोलन मे सभी राजनितिक दल की सक्रिय भूमिका रही है। रेल्वे संघर्ष समिति पूर्णतः गैरराजनितिक है कुछ लोग तोहमत लगाते रहते है। समिति जीवित व सक्रिय है।
"ढाक के तीन पात कहावत चरिथार्थ" सरकार कोई भी हो किसी ने भी जनता के हित को ध्यान रखकर पूर्वजों से लेकर वर्त्तमान पीढ़ी की मांग पर सकारात्मक सोच नही रखी है, रेल्वे संघर्ष समिति पंडरिया ने रेललाइन की विरोध कभी नही किया है, उन्होंने सिर्फ रूट परिवर्तन की मांग की थी। पिछली सरकार और वर्तमान सरकार से रूट परिवर्तन की मांग जनमानस की हितों की रक्षा के लिया किया है। जिसमे ज्यादा से ज्यादा ग्रामीण जनता को लाभ मिले रास्ता आसान सरल शुलभ सभी पर्यटन धार्मिक स्थान कल कारखाने को लाभ मिले। किन्तु पूर्व सरकार ने आंदोलन को कुचलने का काम किया तो वर्तमान सरकार ने भी बहुत ज्यादा अच्छा काम नही किया है, जिसके लिए उसे धन्यवाद दिया जा सके। कुल मिलाकर देखा जाय तो सरकार कोई भी हो क्षेत्रीय जनता रेल नाम पर आजादी के बाद से छले जा रहे हैं। राजनितिक दल के नेताओं को रेलवे आंदोलन के नाम पर लाभ मिलते रहा है। जनता बेचारी के हिस्से मे केवल आश्वासन?