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नगरपालिका अध्यक्ष की कुर्सी खतरे में चर्चाओं का बाजार गर्म।

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वरिष्ठ पत्रकार रामकुमार टंडन की रिपोर्ट

कवर्धा :- विधानसभा कवर्धा 72 का परिणाम 3 दिसंबर को कुछ भी निकलकर आये, किन्तु नगर पालिका परिषद कवर्धा में उथलपुथल होना नगर सहित ग्रामीणों और कांग्रेस संगठन के पदाधिकारियों में चर्चा का विषय बन गया है। अध्यक्ष ऋषि कुमार शर्मा की भविष्य को लेकर राजनितिक गलियारों में मौजूदा हालत जातिवादी मानसिकता शिकार के चलते परंपरागत कांग्रेस के मतदाता समझे जाने वाले समाज के लोगों को अपना फैसला बदलना पड़ा है। कहते हैं कि "जाति है की जाति नही है" यह बात को जानने के लिए 3 दिसंबर के विधानसभा चुनाव के परिणाम का इंतजार कर रहा है। 72 के कांग्रेस प्रत्याशी व प्रदेश सरकार के कद्दावर मंत्री कुछ ऐसे लोगों को ज्यादा महत्व देते थे, इस बात को लेकर भी लोगों में खासी नाराजगी रही है। भाजपा के 15 साल के कार्यकाल में जो लोग साथ छोड़ भाग निकले थे, वही लोग कांग्रेस पार्टी और मंत्रीजी के खासमखास सिपहसालार हैं, विपक्ष में रहकर डंडा खाने वाले बहार हों गये हैं, इस बात को लेकर नाखुशी 5 साल से है, कहीं न कहीं यह बात निकलकर सामने आने लगी है। नगर पालिका परिषद कवर्धा की बात की जाये तो अध्यक्ष ऋषिकुमार शर्मा अपने आर्थिक लाभ को ध्यान में रखकर वन मेन आर्मी की तरह काम करते हैं, बाकी पार्षदों को कोई सम्मानजनक स्थान नही मिलता है, जबकि ऋषि शर्मा भी अन्य पार्षदों की तरह ही वार्ड नंबर 8 से पार्षद चुनाव जीत कर आया है। आर्थिक मदद करने वाले सहयोगी व जाति समीकरण कास्ट कम्बिनेशन के खेल को बिठाने के लिए अन्य बातों को स्थान न देकर शर्मा के नाम का चुनाव किया गया था। तब इस बात पर कोई विचार विमर्श ही नही हुई कि भविष्य में ये भी दिन देखने होंगे कि इनके नाम का असहयोग व विफलता झेलना पड़ेगा। इसका असर शहर तक ही सीमित नही रहा है, ग्रामीण क्षेत्र में भी झेलना पड़ा है। चुंकि अधिकांश ग्रामीणजनों के बच्चे शहर में ही रहकर उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए पढ़ाई लिखाई करने आते हैं। इनके कार्य शैली क्रियाकलाप से सभी परिचित हैं, जिसका दुष्परिणाम सामने है, अभी तो विधानसभा का प्रथम चरण चुनाव सम्पन्न हुआ है, परिणाम आना बांकी है। कुछ जाति वर्ग समुदाय वालों की संख्या ग्रामीण क्षेत्र में अच्छी खासी है। जो कवर्धा में झंडा विवाद हुआ था उसे हिंदूवादी सम्मान से जोड़कर राजनितिक रंग दिया गया था, उससे प्रभावित हों बदलाव के पक्ष में माहौल बना था। माहौल को बिगाड़ने में नगर पालिका को चलाने वालों की भूमिका कम नही रहा है। सारा दोष एक जाति के मत्थे पर मढ़ दिया गया, धार्मिक विवाद बना दिया गया। साधु संत धर्मगुरुओं को भी लाया गया। इस विवाद के हीरो विजय शर्मा बन गया, तो इधर नगर पालिका की ओर से हीरो ऋषि शर्मा और कुछ लोग बनने का असफल प्रयास करते रहे विवाद इतना बढ़ा की प्रशासन के साथ ही नगर के प्रबुद्दजनों की माथे पर चिंता की लकीर दिखाई देने लगी थी।आखिरकार आपसी सामंजस्य से माहौल शांत हुआ, किन्तु राजनितिक लाभ लेने वाले शांत नही बैठे। इसी का परिणाम है कि विकास पुरुष के रूप में अकबर भाई का नाम लिया जाता है, उसके माथे पर चिंता की लकीर चुनाव परिणाम को लेकर खींची हुई है। अकबर भाई ने कभी "जिसकी जीतनी संख्या हों भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी" पर ध्यान नही दिया, उसके राजनितिक दबंगता के आगे आर्थिक लाभ लेने वाले कुछ जातिवादी मानसिकता के महत्वकांक्षी लोग लेते रहे हैं और नेता के रूप में स्थापित रहे हैं। इसकी चिंता भी आवश्यक है। खैर हम चर्चा नगरपालिका अध्यक्ष की भूमिका को लेकर कर रहे थे। उस विषय पर आ जाते है। वाकई इसकी भूमिका पर गहनता से विचार विमर्श होना चाहिए और बदलाव करना भी आवश्यक है, क्योंकि "जाति है की जाति नही है" एक विचारणीय प्रश्न है!

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