अकोला - ता. 26 जून का वह मंगल प्रभात मुझे अच्छी तरह याद है। अकोला में पार्श्वनाथ मंदिर दादावाडी का अंजनशलाका प्रतिष्ठा महोत्सव चल रहा था। परमात्मा का च्यवन कल्याणक विधान 25 जून को किया जा चुका था। हम सभी साधु साध्वी जिन मंदिर में परमात्म भक्ति का आनंद ले रहे थे। जन्म कल्याणक विधान शुरु हुआ ही था। कल्याणक की महिमा चल रही थी कि तभी मुकेश द्वारा दिल दहलाने वाले समाचार मिले। समाचार एक वाक्य का था प्रवर्तिनीजी का एक्सीडेंट हुआ है और उन्हें अस्पताल ले जाया गया है। पल भर के लिये मन स्तब्ध हो गया। आगे क्या करना, कुछ नहीं सूझ रहा था। मन प्रार्थना करने लगा कि उन्हें कुछ नहीं हो... शीघ्र स्वस्थ हो...!
अपने मन को मनाकर मैंने अपने मन को पुनः कल्याणक विधान को पूर्ण करने में लगाया। लगभग आधे घंटे बाद बाहर आकर मुकेश को पुनः पूछा कैसी तबियत है प्रवर्तिनीजी की ! उसने रूआंसा होते हुए प्रवर्तिनीजी के देवलोकगमन के समाचार सुनाये। एक वज्र आघात...! सारी खुशियों को पल भर में लील लेने वाले समाचार...! शासन, गच्छ व समुदाय की अपार क्षति.... हमारी व्यक्तिगत क्षति ! पल भर में ही उनका शान्त प्रशान्त मुसकाता चेहरा आंखों के सामने उभर आया। उनका प्रेम, वात्सल्य स्मृति में छा गया। मैं अपने आसन पर बैठ गया। तभी साध्वी मंडल रूदन करता हुआ आया। उनके दर्द की कल्पना से ही आंखें बरस पडी। उनके तो प्राणाधार थे... गुरु थे...! उनकी वात्सल्यमयी मां थी! मैं अपने मन को सान्त्वना देते हुए उन्हें ढाढ़स बंधाने लगा।
मेरी आंखों के सामने अतीत की तस्वीरें उभरने लगी। मेरी दीक्षा का दूसरा चातुर्मास जो पावापुरी में हुआ था। पूज्य गुरुदेवश्री, पूज्य दर्शनसागरजी म.सा. व मैं हम तीन साधु थे। प्रवर्तिनी श्री सज्जनश्रीजी म. शशिप्रभाश्रीजी म. प्रियदर्शनाश्रीजी म. जयप्रभाश्रीजी म. दिव्यदर्शनाश्रीजी, तत्वदर्शनाश्रीजी व सम्यग्दर्शनाश्रीजी इस प्रकार सात साध्वीजी म. थे।
मुझे आज भी उन दिनों का सारा घटनाकम याद है। मेरी उम्र उस समय मात्र चौदह वर्ष की थी। पूज्य गुरुदेवश्री ने भगवान महावीर की 25वीं निर्वाण शताब्दी के लक्ष्य से अपना चातुर्मास जब पावापुरी घोषित किया था, तभी से उन्होंने तय कर लिया था कि पावापुरी में मेरी पढाई कैसे होगी! क्योंकि वहाँ कोई पंडित तो उपलब्ध नहीं था।
धार्मिक सूत्र कंठस्थीकरण का अध्याय तो पालीताना के पहले चातुर्मास में पूर्ण हो चुका था। अब आगे संस्कृत के अध्याय पढने थे। पालीताना से पावापुरी की ओर विहार में लघु सिद्धान्त कौमुदी और अमरकोष के सूत्र-गाथाओं का कंठस्थीकरण बिना किसी बाधा के निरन्तर चल रहा था। गुरुदेवश्री के मस्तिष्क में भविष्य की योजना पूर्व निर्धारित थी। पावापुरी के चातुर्मास में कौमुदी की साधनिका संपन्न कराने का उनका लक्ष्य था। और इसी आधार पर प्रवर्तिनी श्री सज्जनश्रीजी म. को पत्र लिखकर आदेश दिया था कि चातुर्मास पावापुरी में करना है।
चातुर्मास प्रवेश के बाद श्रावण कृष्णा 2 को श्रवण नक्षत्र में अध्ययन प्रारंभ हुआ था। उस चातुर्मास में ही प्रवर्तिनी श्री शशिप्रभाश्रीजी म. का पहला साक्षात्कार हुआ। उस समय मैं जितना समझ पाता था, मैंने अनुभव किया था कि पूज्य गुरुदेवश्री ने शशिप्रभाश्रीजी म. को अपनी बहिन का सम्मान दिया है। हाँलाकि साधु जीवन स्वीकार करने के बाद नये रिश्ते नाते नहीं बनाये जाते। पर यह परस्पर निश्छल और पवित्र प्रेम का प्रतीक था। जो भावों के आधार पर स्वीकृत था, उसका अन्य आडम्बरों से कोई लेना देना नहीं था।
उस पवित्रता भरे वातावरण के आधार पर मेरा आत्मीय व्यवहार प्रवर्तिनी शशिप्रभाश्रीजी म. के साथ सदैव रहा। मैंने अपने 51 वर्ष के संयमी जीवन में उनकी आंखों में अपने प्रति सदा सदा वात्सल्य, प्रेम और स्नेह की अमिट बरसात पायी है।
एक काल खण्ड में गच्छ समुदाय में चल रही उठापटक के बीच भी मैंने सदा सदा अपने प्रति उनकी मिठास पायी। वे सदा मेरे साथ रहे। यह स्पष्ट कर देना जरूरी है कि वे केवल इसीलिये मेरे साथ नहीं रहे कि मेरे प्रति उनका प्रेम अत्यधिक था। बल्कि इसलिये वे मेरे साथ थे कि उन्हें समुदाय और शासन की मर्यादा का सम्यक् बोध था। मैंने अनुभव किया कि जब वे हमारे साथ थे, तब उनके कई अभिन्न अन्यत्र थे। पर उन्होंने सदा सदा सच्चाई का साथ दिया। अपने मित्र संबंधों को कभी भी सत्य-मार्ग में बाधा नहीं बनने दिया। और यह उनके जीवन की सबसे बडी विशेषता थी। वे बेबाक थे। सही बात कहने में कभी हिचकिचाहट का अनुभव नहीं करते थे, न उन्हें कोई उनके दृढ निर्णय भरे मार्ग से च्युत करने में सक्षम था। कोई प्रलोभन उन्हें स्वीकार्य नहीं था। मुझे वे आत्मीय भावों से सलाह, सूचना देते थे, हित शिक्षा सुनाते थे।
पद का सम्मान करते और बचपन के प्रेम को वात्सल्य देते। आज वे सदेह हमारे बीच नहीं हैं। पर उनका गुण वैभव प्रतिपल हमारी आंखों के सामने हैं।
उनका त्याग! प्रतिदिन एकासणा ही करना और वह भी पुरिमड्ढ के बाद! भीषण गर्मी में भी जब अन्यत्र पानी पीने के लिये नवकारसी के समय की प्रतीक्षा की जाती है, वहाँ । बजे से पहले वे पच्चक्खाण नहीं पारते थे।
प्रतिदिन जब तक वे अपनी स्वाध्याय पोथी का पूरा पाठ नहीं कर लेते और इसके साथ 125 मालाओं का जाप नहीं कर लेते थे, तब तक पच्चक्खाण पारने का सवाल ही पैदा नहीं होता। भले तीन बज जाये। आहार सामग्री कितनी ही ठंडी क्यों न हो, वे अतीव सहजता से अपनी काया को भाडा चुकाने की दृष्टि से उसे प्रसन्नता पूर्वक ग्रहण करते थे।
मैं स्वयं इनकी इन प्रतिज्ञाओं का साक्षी रहा हूँ। कोरोना के वातावरण में लगातार तीन चातुर्मास हमारे साथ हुए। सन् 2020 का जहाज मंदिर, सन् 2021 का पालीताना व सन् 2022 का जयपुर ! इनमें जहाज मंदिर का चातुर्मास मेरे लिये अत्यन्त प्रेरणा भरा था। हमें उनका सतत सानिध्य मिला। इस चातुर्मास में उनका जीवन, उनके विचार, उनकी मनः स्थिति, उनकी दृढ विचार धारा, उनकी संकल्प शक्ति, शासन व प्रभु वाणी के प्रति उनकी अगाध आस्था आदि विभिन्न स्थितियों को बहुत निकटता से देखने, जानने, समझने का अवसर मिला।
एक अहोभाव मेरे रोम रोम में भर उठा हमारा गच्छ, समुदाय कितना भाग्यशाली है कि उसे ऐसे साध्वीजी म. के रूप में अनमोल रत्न मिला है।
अभी दो दिन पहले ही तो प्रवर्तिनीजी से मेरी बात हुई थी। पालीताना में श्री डुंगरचंदजी भंसाली को उपधान कराना था। उन्होंने मुझसे आग्रह किया था कि यह कराना ही है। मैंने कहा- आपकी बात मैंने आज दिन तक कोई टाली है क्या, जो आप इतना आग्रह कर रहे हैं। आपने कहा है तो यह करना ही है। मैं तो नहीं रह पाऊँगा। उपधान प्रवेश करा दूंगा, बाद में मयंक व मेहुल सम्हाल लेंगे। आप कोई चिन्ता नहीं करें।
अकोला प्रतिष्ठा के संबंध में बात हुई थी। रत्ती भर भी कल्पना नहीं थी कि वे इस प्रकार हम सबको छोडकर विदा हो जायेंगे। यह वार्तालाप संघ के प्रति उनके उत्तरदायित्व व सजगता को दिखाता है।
मुझे याद है जब सन् 2016 में पालीताना में खरतरगच्छ साधु साध्वी सम्मेलन का आयोजन था। बडी संख्या में साधु साध्वी पधारे थे। सबने सर्वसम्मति से गच्छ समुदाय को नई दिशा और प्रगति का नया वातावरण अर्पण करने के लक्ष्य से पदारोहण कार्यक्रम तय किया था। उसमें श्री शशिप्रभाश्रीजी म. को प्रवर्तिनी पद देने के प्रस्ताव को सर्वसम्मति मिली थी। सबका एक मत था कि आपको जो और जिसे उचित लगे, वह पद उन्हें अर्पण करने की घोषणा करावें।
ज्योंहि मैंने प्रवर्तिनी पद के लिये शशिप्रभाश्रीजी म.सा. के नाम की घोषणा की थी। सभी के चेहरे प्रसन्नता से परिपूर्ण थे। पर एक चेहरा उदास और विषाद की रेखाओं से भर गया था। वह चेहरा था स्वयं शशिप्रभाश्रीजी म. का! कितनी मुश्किल से मनाया मैंने उन्हें, यह मुझे आज भी याद है। मैंने पूज्य गुरुदेवश्री के नाम का सहारा लिया... आदेशात्मक भाषा का उपयोग किया... मिठास और जिद्द से भरे शब्दों का प्रयोग किया...! बहुत मुश्किल से उन्होंने केवल इसलिये स्वीकार किया कि आपका आदेश है. एक गच्छाधिपति का आदेश है...! अवहेलना के संस्कार नहीं है, इसलिये स्वीकार कर पालन किया।
यह उनकी निस्पृहता की कथा है।
वैसे उनका 80 वर्षों का जीवन... 67 वर्षों का संयमी जीवन विविध कथाओं से भरा पड़ा है, जिनका वर्णन आसान नहीं है। यह उनकी निस्पृहता भरी साधना का ही प्रभाव था कि उन्होंने जो कार्य हाथ में लिया, वह पूर्ण हुआ ही! ऐसा पुण्योदय सबका नहीं होता। कार्य तो बहुत लोग प्रारंभ करते हैं। पर जरूरी नहीं वे पूर्ण भी हों!
पालीताना का बाबु माधोलाल धर्मशाला के साचा सुमतिनाथ मंदिर का ऐतिहासिक जीर्णोद्धार, जयपुर के कटला मंदिर का जीर्णोद्धार, मानसरोवर में मंदिर दादावाडी का स्थापत्य, पालीताना का जिनेश्वर भवन ऐसे कितने कितने कार्य उनकी वाणी से संपन्न हुए हैं। बंगाल देश का उनका विचरण धर्म की अलख जगाने का अनूठा पुरुषार्थ था। आज भी जहाँ जहाँ उन्होंने विचरण किया... जहाँ जहाँ उनके चातुर्मास हुए..., बच्चा बच्चा याद करता है। दुर्घटना के दिन न मालूम कितनी आंखें रोयी होगी... कितनों ने अपने उपकारी गुरु को खोने का दर्द अनुभव किया होगा...!
अकोला में साध्वी कनकप्रभाश्रीजी संवरबोधिश्रीजी समत्वबोधिश्रीजी वार्ता हेतु आये थे। प्रतिष्ठा संबंधी वार्तालाप प्रारंभ हुआ ही था कि प्रवर्तिनीजी म. की चर्चा चल पडी। बहते आंसुओं के साथ वे अपने अनुभव बता रहे थे उनके वात्सल्य का विराट् स्वरूप... उनके अनुशासन के दृढता भरे निर्णय... शिष्य मंडली के भविष्य निर्माण की चिंता...!
आज तीन दिन बीत चुके हैं। मस्तिष्क में रह रह कर उनकी मधुर मुस्कान भरी छवि उभर आती है। वे स्वयं के लिये जितने कठोर थे, सबके लिये उतने ही कोमल थे। आज फूल मुरझा गया पर सौरभ रह गई। वह सौरभ लंबे समय तक हमारा, आपका मार्गदर्शन करती रहेगी। उनके गुणों का स्मरण करना, गुण वैभव को पाने का पुरुषार्थ करना, यही सच्ची श्रद्धांजली होगी। उनकी दिव्य भव्य आत्मा मोक्ष सुख का वरण करे, यही कामना है।
उनका निश्रा प्राप्त साध्वी मंडल साध्वी श्री प्रियदर्शनाश्रीजी, दिव्यदर्शनाश्रीजी, तत्वदर्शनाश्रीजी, सम्यग्दर्शनाश्रीजी, शुभदर्शनाश्रीजी, सौम्यगुणाश्रीजी आदि को यह पीडा सहन करने की शक्ति मिले। वे उनके आदर्शों से अपने जीवन का अध्याय लिखें, यही कामना है।