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“जिनशासन वटवृक्ष है, हम सब उसकी डालियाँ हैं” — आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 18 अगस्त 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में जिनशासन की एकता, परस्पर सम्मान और साधर्मिक वात्सल्य का संदेश दिया।

आचार्य श्री ने कहा कि परमात्मा महावीर का जिनशासन अनादि काल से चला आ रहा है। और वर्तमान में हम भरत क्षेत्र में धर्माराधना कर रहे हैं। यह हमारा विशेष पुण्य है कि हमें देव, गुरु और धर्म की शरण प्राप्त हुई है। महाविदेह क्षेत्र में आज भी सीमंधर स्वामी सहित बीस तीर्थंकर परमात्मा विराजमान हैं और वहाँ निरंतर धर्माराधना चल रही है। हमारी भावना ऐसी साधना करने की होनी चाहिए, जिससे आत्मकल्याण हो और पुनः ऐसे वातावरण में जन्म लेने की आवश्यकता न पड़े।

आचार्य श्री ने कहा कि आज हमें अपने जिनशासन के व्यापक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है। जिनशासन एक विशाल वटवृक्ष के समान है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं—मंदिरमार्गी, स्थानकवासी, तेरापंथी, दिगंबर तथा इनके अंतर्गत अनेक गच्छ और परंपराएँ। जिस प्रकार वटवृक्ष की बड़ी-छोटी डालियों में न अहंकार होता है, न ईर्ष्या और न ही एक-दूसरे से कोई शिकायत, उसी प्रकार जिनशासन की विभिन्न परंपराओं में भी परस्पर प्रेम, सम्मान और सहयोग का भाव होना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट कहा कि “अपने गच्छ का विकास करना गच्छवाद नहीं है, लेकिन दूसरे गच्छ की निंदा करना गच्छवाद है।” हम सभी जिनशासन के सिपाही हैं। किसी साधर्मिक भाई अथवा दूसरे गच्छ को आगे बढ़ता देखकर हमें प्रसन्न होना चाहिए। यदि अपनों की प्रगति हमें आनंद नहीं देती, तो समझना चाहिए कि हमने धर्म का पहला पाठ अभी सीखा ही नहीं है।

आचार्य श्री ने कहा कि जिनशासन की विभिन्न परंपराएँ उसकी अलग-अलग डालियाँ हैं, किंतु इन सभी की जड़ एक ही है—भगवान महावीर की श्रमण परंपरा। खरतर पदवी आचार्य जिनेश्वरसूरिजी की परंपरा को प्राप्त हुई और उसी से खरतरगच्छ नाम प्रसिद्ध हुआ। इसी प्रकार तपश्चर्या के कारण आचार्य जगतचंद्रसूरिजी की परंपरा तपागच्छ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

अपने मंगल संदेश में आचार्य श्री ने कहा कि हमारा एक ही एजेंडा होना चाहिए—निश्चय से अपनी आत्मा का कल्याण और व्यवहार से जिनशासन की उन्नति। इसलिए न किसी की निंदा करें, न ईर्ष्या करें; बल्कि एक-दूसरे का हाथ पकड़कर आगे बढ़ें। जब सभी परंपराएँ प्रेम, सम्मान और सहयोग के साथ आगे बढ़ेंगी, तभी जिनशासन का यह विशाल वटवृक्ष और अधिक हरा-भरा, सशक्त एवं समृद्ध बनेगा।

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