BREAKING

“परमात्मा नेमिनाथ का जन्मकल्याणक एवं साध्वी श्री सुलक्षणाश्रीजी म. का जन्मदिवस : वैराग्य और तप का अनुपम संगम” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

Share:

हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 17 अगस्त 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव राष्ट्ररत्न, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने मंगल प्रवचन में तप की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि तप केवल शरीर को कष्ट देने का नाम नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करने और जीवन को सार्थक बनाने की साधना है। तप के साथ सेवा, विनय, संयम और सकारात्मकता जुड़ जाएँ, तो साधना अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त करती है।


आचार्य श्री ने कहा कि आज परमात्मा नेमिनाथ का जन्मकल्याणक तथा तपोमूर्ति, समत्व-सिंधु गुरुवर्या श्री सुलक्षणाश्रीजी महाराज का जन्मदिवस—दोनों ही आत्मिक प्रेरणा के पावन अवसर हैं। परमात्मा नेमिनाथ का जीवन वैराग्य, करुणा और आत्मकल्याण की प्रेरणा देता है। उनका वैराग्य हमें सिखाता है कि संसार की सुख-सुविधाओं के बीच रहते हुए भी आत्मकल्याण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जा सकती है। वहीं साध्विवर्या का जीवन तप, त्याग और प्रभुभक्ति को आचरण में उतारने की प्रेरणा प्रदान करता है।

नाग पंचमी के संदर्भ में गुरुदेव श्री ने समाज को महत्वपूर्ण संदेश देते हुए कहा, “जिंदगी में कभी भी अमृत उंडेलने का काम करना, अमृत न उंडेल सको तो मौन रहना, लेकिन कभी भी ज़हर उंडेलने का काम मत करना।” उन्होंने कहा कि स्वार्थ के कारण समाज, परिवार, संप्रदाय अथवा देश में विष न घोलें। हमारे शब्द संबंधों को जोड़ने वाले हों, तोड़ने वाले नहीं। जीवन में प्रेम, सकारात्मकता और भक्ति का वातावरण निर्मित करना ही सच्ची साधना है।


आचार्य श्री ने तपस्वियों की आराधना की अनुमोदना करते हुए पर्युषण पर्व में सामूहिक अठ्ठाइयों की आराधना का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कुलपाकजी तीर्थ के 1400 वर्ष पूर्ण होने के निमित्त “चौदह सौ अठ्ठाइयों का अनुपम वातावरण” निर्मित होना चाहिए। यह सामूहिक तप-आराधना धर्म के प्रति हमारी श्रद्धा, समर्पण और जागरूकता का परिचायक बने।

इस अवसर पर पूज्या गणिनी प्रवरा श्री सुलोचनाश्रीजी म.सा. की सुशिष्या पूज्या साध्वी श्री प्रियकल्पनाश्रीजी म.सा. ने तपोमूर्ति, समत्व-सिंधु गुरुवर्या श्री सुलक्षणाश्रीजी महाराज को उनके जन्मदिवस पर श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए कहा, “वह पत्थर भाग्यशाली होता है, जो प्रतिमा का रूप धारण करता है और वह धरती धन्य होती है, जहाँ ऐसे महान रत्न जन्म लेते हैं।” उन्होंने गुरुवर्या श्री के तप, त्याग, प्रभुभक्ति, अनुशासन, वात्सल्य एवं अनुपम वैयावच्च को स्मरण करते हुए कहा कि उनका जीवन साधना और सेवा की प्रेरणादायी मिसाल था। वे दूसरों की वैयावच्च को भी अपनी कर्मनिर्जरा का अवसर मानती थीं।

गुरुवर्या श्री के जन्मदिवस के पावन अवसर पर श्री गुन्नु नाहर ने भावपूर्ण गीत की प्रस्तुति दी।

Share:

Popular News