रायपुर - श्री दिगम्बर जैन खंडेलवाल मंदिर जी, सन्मति नगर, फाफाडीह, रायपुर में पर्वाधिराज दशलक्षण महापर्व के पावन अवसर पर नौवें दिवस उत्तम आकिंचन्य धर्म की आराधना की गई। प्रातःकाल भक्तों ने मंदिर जी में इन्द्रों की वेशभूषा में अभिषेक शांतिधारा से लेकर पर्व पूजाएं कर धर्मलाभ लिया।
आज उत्तम आकिंचन्य धर्म के दिन श्री महावीर स्वामी के समक्ष मूल वेदी में शांतिधारा का सौभाग्य श्री अशोक कुमार जी प्रशांत कुमार, प्रदीप प्रबोध पाटनी परिवार को प्राप्त हुआ।
समित्ति के अध्यक्ष अरविंद बडजात्या ने बताया कि नौंवें दिवस में प्रथम तल में भगवान पार्श्वनाथ की वेदी पर शांतिधारा का सौभाग्य श्री ताराचंद जी अरविंद कुमार, अभिषेक, रोहित सेठी, औरंगाबाद (प. बंगाल) परिवार को प्राप्त हुआ। भगवान मुनिसुव्रतनाथ की वेदी पर शांतिधारा निकेश जी शैलेष जी गोधा परिवार द्वारा की गई।
प्रतिदिन के अनुसार संध्या समय श्रीमती उषा लोहाड़िया एवं श्रीमती वर्षा सेठी के निर्देशन में श्रावक प्रतिक्रमण कराया गया।
शास्त्र सभा में स्थानीय विद्वान पं. नितिन जैन 'निमित्त' ने बताया ओग विलास की चीजों और क्रोध, मान, माया लोभ का त्याग सबसे बड़ा माना गया है। त्याग करने से लोभ और मोह कम होता है।
दान और त्याग में फर्क यह है कि दान अपने लिये थोडा रखकर थोड़ा दिया जाता है, जबकि त्याग में पूरा का पूरा छोड़ा जाता है।
दान दूसरे की अपेक्षा से दिया जाता है, त्याग किसी की अपेक्षा से नहीं सिर्फ वस्तु को छोड़ा जाता है। त्याग और दान अहंकार की भावना से नहीं करना चाहिए।
आत्मशुद्धि के उद्देश्य से विकार भाव छोड़ना तथा स्व पर उपकार की दृष्टि से धन आदि का दान करना भी त्यागधर्म है।
है। समाज की उन्नति के लिये जो धन खर्च किया जाये प्रेम संगठन बढ़ाने के लिये जो द्रव्य लगाया जावे यह सब समदान हूं। जैसे धर्मशाला बनवाना विद्यालय पाठशाला खोलना, प्रीति भोज करना सभा समिति स्थापित करना, प्रचारकों द्वारा प्रचार करना आदि इसके उदाहरण हैं।
दान देते समय दाता को प्रसन्न भाव रखना चाहिये। दान देते समय हृदय में ना तो क्रोध की भावना आनी चाहिये ना ही अभिमान जायत होना चाहिये। ईर्ष्या भाव से दान देने का भी यथार्थ फल नहीं मिलता। किसी फल या नाम यश की इच्छा से दान करना भी प्रशंसनीय या लाभदायक नहीं होता। दाता को शांत नम्र, सरल, निर्लोभी, विनायवान एवं संतोषी होना चाहिए।
एक बार दान का संकल्प ले लेने के बाद कभी पीछे नहीं हटना चाहिये न ही उस दान को अधिक विलंब करना चाहिये। शास्त्रों में तो ये भी लिखा है कि दान बोलने के बाद राशि पहले दो पानी बाद में पियो।
: अरविंद बड़जात्या ::
25 Aug 2026