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“कर्तव्य नहीं, उत्तरदायित्व चाहिए” — आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026

हैदराबाद - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 25 अगस्त 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव राष्ट्ररत्न, खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कर्तव्य और उत्तरदायित्व के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि ‘कर्तव्य’ शब्द सुनते ही व्यक्ति को सर्वप्रथम अपने बारे में विचार करना चाहिए—मेरा कर्तव्य क्या है, किन परिस्थितियों में क्या है और किस संबंध के प्रति मेरा क्या कर्तव्य है?

आचार्य श्री ने कहा कि समस्या यह है कि हम दूसरों के कर्तव्यों के बारे में अधिक विचार करते हैं, जबकि अपने कर्तव्यों के बारे में कम सोचते हैं। पिता यह सोचता है कि पुत्र का मेरे प्रति क्या कर्तव्य है, लेकिन यह नहीं सोचता कि मेरा पुत्र के प्रति क्या कर्तव्य है। सास बहू से अपने प्रति कर्तव्य की अपेक्षा करती है, लेकिन स्वयं अपने बहू के प्रति कर्तव्य पर विचार नहीं करती। जब कर्तव्य सौदे की भाषा बन जाता है—“वह अपना कर्तव्य निभाएगा, तो मैं भी निभाऊँगा”—तब संबंधों में अपेक्षाएँ बढ़ती हैं और अशांति जन्म लेने लगती है।


“सामने वाला प्रेम करेगा तो मैं प्रेम करूँगा, वह मधुर बोलेगा तो मैं मधुर बोलूँगा”—यह सोच हमारे व्यवहार को परिस्थितियों पर निर्भर बना देती है। यही भाव संबंधों में भेद और दूरी का कारण बनता है। हमारा व्यवहार सामने वाले के व्यवहार पर नहीं, बल्कि अपने संस्कारों और अपने उत्तरदायित्व पर आधारित होना चाहिए।

उन्होंने समझाया कि कर्तव्य का भाव है—“करना चाहिए”, जबकि उत्तरदायित्व का भाव है—“करना ही है।” यही दोनों शब्दों के भाव में मूल अंतर है। परिवार, दुकान और मकान के प्रति हम अपने उत्तरदायित्व को लेकर सजग रहते हैं, लेकिन क्या कभी हमने यह विचार किया है कि जिनशासन, समाज, धर्म और गुरु भगवंतों के प्रति हमारे क्या उत्तरदायित्व हैं और हम उनका कितना निर्वाह कर रहे हैं?

आचार्य श्री ने कहा कि हमारे पास सत्ता, संपत्ति, समृद्धि, सुंदर काया, पद, प्रतिष्ठा, यश और मान-सम्मान है। इनके पीछे हमारा पुण्य है और यह पुण्य धर्म एवं जिनशासन की आराधना से अर्जित हुआ है। हमने परमात्मा की पूजा की, उनकी वाणी सुनी और आराधना की, तभी पुण्य का बंध हुआ। इसलिए जिनशासन के प्रति हमारे अंतर में अगाध प्रेम, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा समर्पण केवल नारों और शब्दों तक सीमित नहीं होना चाहिए। हमारे भीतर ऐसा भाव विकसित होना चाहिए कि जिनशासन के विपरीत अथवा उसके विरुद्ध कोई बात न हम सुन सकें और न बोल सकें। शासन के प्रति प्रेम केवल कहने से नहीं, बल्कि अपने जीवन में उसके प्रति उत्तरदायित्व निभाने से सिद्ध होता है।

गुरुदेव श्री ने कहा—“धर्मो रक्षति रक्षितः।” जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। जो व्यक्ति परमात्मा के प्रति श्रद्धा रखता है और जिनशासन के प्रति अपने कर्तव्य एवं उत्तरदायित्व का निष्ठापूर्वक निर्वाह करता है, वही वास्तव में धर्म के साथ जुड़ता है। यही समर्पण जीवन को सार्थक बनाता है और आत्मा को सिद्धि एवं परम शांति की दिशा में आगे ले जाता है।

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