धर्म कार्य को कल पर कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि पता नहीं कल क्या हो जाए : - श्री विशुद्ध सागर जी महाराज साहेब
धमतरी - उपाध्याय प्रवर अध्यात्म योगी परम पूज्य महेंद्र सागर जी महाराज साहेब युवा मनीषी परम पूज्य मनीष सागर जी महाराज साहेब के शिष्य रत्न युवा संत परम पूज्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज साहेब ने आज के प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि ज्ञानी भगवंत कहते हैं मनुष्य जन्म अत्यंत दुर्लभ है। और संसार का परम सत्य है मृत्यु। इस जन्म और मृत्यु के बीच का समय है जीवन। इस जीवन में हमे धर्म करते रहना है। क्योंकि आते आते श्वास कैसे और कब रुक जायेगा पता नहीं। मौत के आने के बाद हम कुछ भी नही कर पाएंगे। जो हमारे मन में है वो मन में ही रह जायेगा। इसलिए हे मानव तू जीवन में केवल धर्म को स्थान दे ताकि आने वाले भव में सुख को प्राप्त कर सके। धर्म कार्य को कल पर कभी नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि पता नहीं कल क्या हो जाए। इसलिए धर्म कार्य को तत्काल कर लेना चाहिए। और पाप कार्य को हमेशा कल पर टालते रहना चाहिए। भगवान राम को कल राज्य मिलने वाला था लेकिन आज वनवास मिल गया। अर्थात आने वाले पल में क्या होगा किसी को पता नहीं। और यही शाश्वत सत्य है। जीवन का पल न जाने कब बीत जायेगा। और ये बिता हुआ पल कभी वापस नहीं आता। इसलिए ज्ञानी कहते हैं आने वाले पल को हमेशा पकड़कर रखना चाहिए। अगर ये एक बार छूट गया तो फिर कभी हाथ नहीं आएगा। इसलिए इस संसार में जीवन की घड़ियां समाप्त होने से पहले साथ ले जाने के लिए धर्म की गठरी बांध कर रख लो। यही धर्म गठरी हमे भवपार लगाएगा। हमें ज्ञानी बनने का प्रयास करना है अर्थात सत्य को स्वीकार करना है। ताकि संसार में जीवन के आवागमन को दूर कर सके। संसार भ्रमण के कार्य से अवकाश मिल सके। मुक्ति महल में जाकर हम परम सुख को प्राप्त कर सके। संसार की हर विपदा से हम मुक्त हो सके।
हम किसी भी कार्य को करते समय अंतिम क्षणों में सावधान हो जाते हैं विचार करना हैं क्या हमनें कभी ये विचार किया कि इस जीवन का अगला क्षण अंतिम क्षण हो सकता है? हम कभी भी इस सत्य को स्वीकार नहीं कर पाते है इसलिए सावधान भी नहीं होते हैं।
एकांतवादी इस संसार में बहुत है। अपने इसी भाव के कारण ऐसे लोगो ने अपना संसार भ्रमण बढ़ाया है। मेरा है वही सच्चा है ऐसी भावना रखने वाला ही एकांतवादी कहलाता है। एकांतवादी स्वतंत्र होना चाहता है। संसार में स्वतंत्र होना गलत नहीं है लेकिन स्वच्छंद होना गलत है। जबकि अनेकांतवाद को मानने वाला संसार से मुक्त हो सकता है।
एकांतवाद - जो क्रिया एकांत में या अंधकार में किया जा सकता है वह पाप कार्य कहलाता है। यही एकांतवाद है।
अनेकांतवाद - जो कार्य सबके सामने किया जा सके। दिन के उजाले में किया जा सके वह पुण्य का कार्य होता है। यही अनेकांतवाद है। अज्ञानी अपने हर कार्य को कल पर टाल देता है जबकि उसके अगले पल का अगले श्वास का पता ही नहीं है। जबकि ज्ञानी अपने कार्यों को कभी कल पर नही टालते है। उनका पुत्र जीवन पुरुषार्थ में व्यतीत होता है। कभी भी धर्म कार्य को तत्काल कर लेना चाहिए। इसी धर्म के सहारे जीवन नैय्या को भवपार लगाया जा सकता है। हमने इस संसार में धन , संपत्ति आदि बहुत प्राप्त कर लिया लेकिन ये कुछ भी साथ जाने वाला नहीं है। अब इस संसार में कुछ ऐसा प्राप्त करने का पुरुषार्थ करना है जो पर भव में साथ जा सके। पर भव में जिसके सहारे हम सुखी हो सके। इस नाशवान संसार में हमारा कर्म ही है जो हमारे साथ जायेगा। इसलिए हे चेतन जीवन में धर्म कर्म को प्राथमिकता दे। जीवन में हरपल धर्म कार्य के लिए तैयार रहें। यही धर्म हमारे आने वाले भव को सरल और सुखी बना सकता है।
*धर्म चार प्रकार के होते है*
दान धर्म - जीवन में कभी भी सुपात्र दान का अवसर नहीं खोना चाहिए। दान कभी भी छपा कर नहीं छिपा कर देना चाहिए।
शील धर्म - जीवन में शील धर्म का पालन करने वाला ही आत्मा का विकास कर सकता है। शील अर्थात चरित्र से शुद्ध होना।
तप - इच्छाओं को रोकना ही तप कहलाता है। तप आत्मा के विकास के लिए होता है। तप में शरीर को तपाकर आत्मा को शुद्ध और मुक्त करने का साधन है।
भाव - हमारे भाव हमेशा शुद्ध होना चाहिए। भावों से हमेशा परमात्मा का चिंतन करना चाहिए। परमात्मा का चिंतन करने वाला कभी अधर्म कार्य नही करता।
ज्ञानी कहते हैं आत्मा के लिए दुख टलने पर सुख मिलता है लेकिन दोष टलने पर मोक्ष मिलता है। हमें सुख के समय में सावधान रहने वाला और दुख के समय समस्या का समाधान खोजने वाला बनने का प्रयास करना है।
आत्मा के विकास के लिए तीन कार्य अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
संकल्प - ये बीज के समान है।
साधना - ये वृक्ष के समान है
सिद्धि - ये वृक्ष में लगे फल के समान है।