बिलासपुर - बहुमण्डलीय श्री सिद्धचक्र विधान जैन श्रावकों के लिए बहुविधहिताय और कल्याणार्थ है। शुद्ध भाव से यह अनुष्ठान करने से हमारे जीवन एवं घर गृहस्थी के समस्त पाप-ताप और संताप नष्ट हो जाते हैं। यही कारण है कि प्रत्येक जैन श्रावक अपने जीवन भर में हुए ज्ञात-अज्ञात पापों के प्रायश्चित के लिए कम से कम एक बार सिद्धचक्र महामंडल विधान अवश्य करना चाहता है । इसे सर्वसिद्धिदायी और मंगलकारी विधान के रूप में जाना जाता है। विश्व शांति तथा प्राणीमात्र की सुख-समृद्धि व कल्याण की मंगल कामना के साथ श्रीमंत सेठ प्रवीण शकुन जैन, प्रशांत जिमी जैन, विहान, टियारा एवं समस्त कोयला परिवार द्वारा श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर क्रांतिनगर बिलासपुर में प्रारम्भ हुआ श्री 1008 सिद्धचक्र महामंडल विधान हवन यज्ञ के साथ संपन्न हुआ। अनुष्ठान के प्रथम दिन आठ अर्घ के साथ प्रारंभ एवं प्रतिदिन द्विगुणित होते हुए आठवें दिन 1024 श्लोकों के साथ अर्घ समर्पित किए गए। इस प्रकार आठ दिन में कुल 2040 अर्घ चढ़ाये गए और जैन समाज का सबसे बड़ा विधान सम्पन्न हुआ। जैन मंदिर में सुबह छह बजे सर्वप्रथम श्री जी का अभिषेक और शांति धारा की गई। चूंकि विधान का आखिरी दिन था इसलिए विशेष विशेष रूप से सरस्वती पूजन किया गया। ललितपुर से पधारे विधानाचार्य बाल ब्रह्मचारी मनोज भैया एवं पंडित मधुर जी जैन ने बड़े ही सरल तरीके से विधान की व्याख्या करते हुए इस अनुष्ठान को सफलतापूर्वक संपन्न कराया।
पूजन के पश्चात् और हवन प्रारम्भ करने के पूर्व विधानाचार्य जी ने बताया कि जैन परंपरा में पूजा, उपासना का विशेष महत्व है, जिनमें से सिद्धचक्र महामंडल विधान की और भी अधिक महिमा है। उन्होंने इस विधान की महिमा बताते हुए कहा कि यह एक ऐसा अनुष्ठान है जो हमारी जीवन के समस्त पाप-ताप और संताप को नष्ट कर देता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को हमेशा समता भाव से कर्म पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, लड़ झगड़ कर नहीं। जब भी साधु-संत और जिनवाणी का सानिध्य मिले तो देरी न करें, तत्काल उनकी वाणी को ग्रहण करें। साधु संतों के दर्शन व आशीर्वाद से जीवन में काफी परिवर्तन आता है। वही मनुष्य अपने जीवन को धन्य बना सकता है, जो जीवन में निष्कपट भाव से गुरु की सेवा करता है । गुरु के चरण दबाना जरूरी नहीं है, गुरु भक्ति जीवन में सदैव बनी रहे उसके लिए गुरु के गुणों का विस्तार करना जरूरी है। जिन गुरु के सान्निध्य में उन्नति का मार्ग मिलता है, उसकी महिमा करना ही श्रेष्ठ गुरु भक्ति मानी गई है। बिना गुरु की कृपा के मोक्ष मार्ग भी संभव नहीं होता है। इस अवसर पर आचार्य विद्यासागरजी के चरणों में कोटिश वंदन करते हुए भजनों के माध्यम से श्रावक-श्राविकाओं ने अपनी भक्ति भावना प्रस्तुत की। आठ दिवसीय आयोजन में भक्ति की बयार बही और आचार्यश्री विद्यासागर के बताए मार्ग पर चलते हुए समग्र समाज के महिला और पुरुषों ने बड़ी संख्या में भाग लेकर कार्यक्रम को सफल बनाया।
सिद्धचक्र महामण्डल विधान प्रारम्भ होने के पूर्व विधानाचार्य जी द्वारा आठ दिवसीय विधान के दौरान एक विशेष जाप करने का संकल्प दिलवाया गया था, इन आठ दिनों में समाज के लोगों में भक्ति एवं उत्साह की ऐसी बयार बही कि विधान में शामिल धर्मानुरागियों ने दो हजार से ऊपर जाप की माला पूर्ण कर ली। विधान संपन्न होने के उपरान्त विधानाचार्य जी ने सभी श्रद्धालुओं से कहा कि सभी को नियम दिलवाया कि चाहे जीवन में कितनी भी विषम परिस्थिति आ जाए, कोई भी आत्महत्या नहीं करेगा और उसका विचार भी मन में नहीं लाएगा।
विधान के दौरान माता जी ने समाज के लोगों से कहा कि हो सके तो सकल जैन समाज बिलासपुर को मिलकर एक बार श्री सम्मेद शिखरजी में यह विधान आयोजित करना चाहिए। जैन शास्त्र अनुसार 24 में से 20 तीर्थंकर परमात्मा श्री सम्मेद शिखरजी की विभिन्न चोटियों से निर्वाण को प्राप्त हुए हैं। यह पवित्र स्थल ‘सिद्धिक्षेत्र’ भी कहलाता है, इस महान एवं पवित्र भूमि के दर्शन मात्र से ही कर्मो का क्षय होता है। इस पवित्र तीर्थस्थल पार्श्वनाथ पर्वत की सबसे खास बात यह है कि यहां शेर जैसे हिंसक प्राणी भी स्वतंत्र होकर घूमते हैं, और किसी को कोई हानि नहीं पहुंचाते हैं, जो कि इस तीर्थराज की महिमा का प्रत्य़क्ष प्रमाण है। ऐसा माना जाता है कि जैनधर्म को मानने वाला जो भी अनुयायी अपने जीवन में सम्मेद शिखरजी की तीर्थयात्रा पूरी आस्था, निष्ठा और सच्चे भाव से करता है और जैन तीर्थकरों द्धारा बताए गए उपदेशों और सिद्धान्तों का नियमपूर्वक पालन करता है, तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है और इस दुनिया के सभी जन्म-कर्म के बंधनों से अगले कई जन्मों तक वह मुक्त रहता है।
सायंकालीन आरती के पश्चात् टीकमगढ़ से आये रंग मंच के कलाकारों ने श्रीपाल - मैनासुंदरी के जीवन को बहुत ही मार्मिक तरीके से प्रस्तुत किया गया। हजारों साल पहले मैना सुंदरी नामक महिला ने पहली बार सिद्ध चक्र महामंडल विधान किया था और इसे करने से उसके पति श्रीपाल के साथ-साथ सारे गांव का कुष्ठरोग ठीक हो गया था।