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“सवालों के जवाब जिंदगी का हिस्सा होना चाहिए” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद - त्रयनगर स्थित कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 8 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव राष्ट्ररत्न, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में जीवन से जुड़े विविध आध्यात्मिक एवं धार्मिक प्रश्नों का समाधान करते हुए कहा कि जीवन में उठने वाले सवालों के जवाब केवल जानकारी तक सीमित नहीं रहने चाहिए, बल्कि वे हमारे जीवन का हिस्सा बनने चाहिए। हमारी जिज्ञासाएँ केवल संतुष्टि एवं तृप्ति तक सीमित न रहें, बल्कि जीवन में सुंदर एवं परिवर्तनकारी स्थिति का निर्माण करें—तभी उनका वास्तविक लाभ है।

पूजा के वस्त्रों में सामायिक करने संबंधी प्रश्न पर गुरुदेव श्री ने कहा कि पूजा के वस्त्र पवित्र माने जाते हैं। जब परमात्मा का स्पर्श करना हो, तब मन की शुद्धि, तन की शुद्धि, भावों की शुद्धि, वस्त्रों की शुद्धि एवं उपकरणों की शुद्धि—इन सभी का ध्यान रखना आवश्यक है। इनमें मूल आधार भावशुद्धि है और पूजा के वस्त्र भावशुद्धि में निमित्त बनते हैं। पूजा के वस्त्रों में सामायिक की जा सकती है, लेकिन यह सावधानी आवश्यक है कि वे वस्त्र किसी भी रूप में अपवित्र न हों।

महिलाएँ ‘नमो सिद्धाचार्योपाध्याय सर्वसाधुभ्यः’ क्यों नहीं बोलतीं—इस प्रश्न पर गुरुदेव श्री ने स्पष्ट किया कि यह एक परंपरा है। उन्होंने सिद्धसेन दिवाकर आचार्य भगवंत का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि लगभग 2100 वर्ष पूर्व उन्होंने नवकार महामंत्र के पाँच पदों को संस्कृत भाषा में रूपांतरित किया था। गुरु ने उनके इस प्रयास में अहंकार के साथ परमात्मा की मूल वाणी की आशातना का भाव देखा और उन्हें समझाया कि अनुवाद करना अलग बात है तथा मूल वाणी को रूपांतरित करना अलग। परमात्मा की वाणी को कौन बदल सकता है? वह तो तीर्थंकरों की वाणी है। इस अपराध के प्रायश्चित स्वरूप उन्हें बारह वर्ष तक साधु-वेश का त्याग कर विचरण करने तथा राजा विक्रमादित्य को प्रतिबोध देने का दायित्व मिला। सिद्धसेन दिवाकर आचार्य भगवंत ने इस प्रायश्चित को हृदय से, सरलता से, सहजता से एवं विनयपूर्वक स्वीकार किया।

सामायिक की विधि के संबंध में आचार्य श्री ने कहा कि मूल सूत्र सभी स्थानों पर समान हैं, जबकि विधि-विधान में परंपराओं के अनुसार कुछ अंतर हो सकता है। खरतरगच्छ परंपरा में तीन बार ‘करेमि भंते’ बोला जाता है, जबकि तपागच्छ परंपरा में एक बार बोला जाता है। इसके पीछे कारण केवल शास्त्र एवं परंपरा का अंतर है।

अभिग्रह का अर्थ समझाते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि अभिग्रह अर्थात् दृढ़ संकल्प ग्रहण करना, जिसमें किसी प्रकार का समझौता नहीं होता। भगवान महावीर ने तेरह बोल का अभिग्रह लिया था। बारह बातें पूर्ण हो गईं, किन्तु एक बात पूर्ण न होने पर भी उन्होंने अपने अभिग्रह में कोई समझौता नहीं किया। उन्होंने प्रेरणा देते हुए कहा कि हम संसार में कितना समझौता करते हैं, लेकिन धर्म में भी समझौता करने लगते हैं। अभिग्रह अर्थात् अभिग्रह—उसमें कोई समझौता नहीं। जब तक अभिग्रह पूर्ण नहीं होता, तब तक उपवास चलता है।

मंगल प्रवचन के समापन पर गुरुदेव श्री ने कहा कि परमात्मा की वाणी के कुछ शब्द भी यदि मनुष्य अच्छी तरह सुन ले और उन्हें जीवन में उतार ले, तो उसका जीवन बदल सकता है। उन्होंने कहा कि वास्तविक लाभ तभी है, जब हमारे जीवन में ऐसा परिवर्तन आए कि गुरुदेव श्री का विहार हो, तब श्रद्धालु उनके साथ चलने के लिए प्रेरित हों।

प्रवचन के पश्चात् पूज्य मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म.सा. ने आगामी रविवार के कार्यक्रमों की जानकारी देते हुए बताया कि “Gen Z — The Art of Unplugging: Finding Inner Peace Beyond the Screen” विषय पर विशेष प्रवचन होगा। इसके साथ ही बच्चों के लिए अष्टप्रकारी पूजा प्रशिक्षण एवं बाल संस्कार शिविर तथा 13 से 28 वर्ष के युवक-युवतियों के लिए “भक्ति सरगम” प्रतियोगिता आयोजित की जाएगी। उन्होंने सभी कार्यक्रमों में अधिक से अधिक श्रद्धालुओं से सहभागिता का आह्वान किया।

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