हैदराबाद - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत दिनांक 6 सितंबर 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में जीवन में सामंजस्य, परिवर्तन और आत्मस्वरूप की पहचान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि कल और आज में क्या अंतर है? सूर्योदय वही है, धूप वही, गर्मी वही, हवाएं वही, नमी वही, आप वही और मैं भी वही। फिर अंतर क्या है? अंतर हमारी पर्याय में है।
पूज्यश्री ने अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि एक बार दर्पण में अपना चेहरा देखा तो स्वयं चौंक गए। बैनरों पर जिस स्वरूप को देखते आए थे, उसमें लंबे बाल और दाढ़ी थी, जबकि दर्पण में कुछ और दिखाई दे रहा था। तब भीतर से आवाज आई कि न बैनर वाला स्वरूप तेरा असली है और न दर्पण वाला। ये दोनों तो मिटने वाली पर्याय हैं। तेरा वास्तविक स्वरूप तो निराकार, निरंजन, सच्चिदानंदमय आत्मा है। उन्होंने कहा कि जो मिटने वाला है, उसके प्रति मोह क्यों करना?
गुरुदेव ने केशलोच के संदर्भ में आई जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहा कि केशलोच केवल शरीर को कष्ट देने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह साधु के संयम, दृढ़ता और सहनशीलता की परीक्षा है। संयम सुख प्राप्त करने के लिए नहीं, बल्कि साधना के लिए लिया जाता है। थोड़ी पीड़ा सहकर भी साधक अपने भीतर की दृढ़ता और सहनशक्ति को परखता है।
आज प्रत्येक व्यक्ति को अपने परिवार और जीवन में सामंजस्य पर चिंतन करने की आवश्यकता है। जीवन समस्याओं से रहित नहीं है। भगवान महावीर को अनेक उपसर्ग सहने पड़े, भगवान राम को राज्याभिषेक के स्थान पर वनवास मिला और श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ तथा उनका जीवन भी अनेक संघर्षों से भरा रहा। फिर हमारे जीवन की छोटी-छोटी समस्याएं हमें इतना दुखी क्यों कर देती हैं? समस्या से अधिक महत्वपूर्ण उसके प्रति हमारी प्रतिक्रिया है।
मोबाइल के तीन बटनों—“सेव, फॉरवर्ड और डिलीट”—का उदाहरण देते हुए कहा कि जीवन में भी इन तीन बटनों की आवश्यकता है। जो बातें आत्मा, परिवार और समाज के लिए लाभकारी हैं, उन्हें सेव करो और आगे फॉरवर्ड करो। जो बातें कषाय, तनाव और टकराव पैदा करती हैं, उन्हें डिलीट कर दो। यही जीवन में सामंजस्य बनाए रखने का सरल सूत्र है।
सामंजस्य का अर्थ है थोड़ा-बहुत छोड़ना, थोड़ा त्याग करना और सामने वाले को भी त्याग का अवसर देना। जहां अहंकार और स्वार्थ हावी होते हैं, वहां समस्याएं पैदा होती हैं। वहीं जहां प्रेम, सहनशीलता और त्याग होता है, वहां परिवार और संबंधों में प्रसन्नता आती है। हर बात में अपनी ही बात मनवाने का आग्रह सामंजस्य को समाप्त करता है।
उन्होंने कहा क्रिया प्रतिक्रिया को जन्म देती है। आप प्रेम देंगे तो प्रेम मिलेगा और शांति देना सीखेंगे तो शांति ही प्राप्त होगी। इसलिए जीवन में सामंजस्य बाहर से आने वाली कोई वस्तु नहीं, बल्कि हमारे अपने विचारों, भावों और व्यवहार से निर्मित होता है। सामंजस्य हमारे अपने हाथों में है—विचार बदलेंगे, भाव बदलेंगे तो संबंध और जीवन भी बदल जाएगा।
07 Sep 2026