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रायपुर की पावन धरा पर तपोनिष्ठ संतों का अलौकिक मंगल सानिध्य: आदिनाथ दिगंबर जैन बड़ा मंदिर में संपन्न हुए अभिषेक, शांतिधारा एवं पावन आहार-चर्या।

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मोह त्याग और समता भाव का पाठ पढ़ा रहे हैं दिगंबर संत, श्रद्धालुओं ने लिया आहार-दान का सौभाग्य।

रायपुर - आज ४ नवम्बर २०२६ - श्री दिगम्बर जैन आदीश्वरधाम, नवोदय तीर्थ समयोपदेश वर्षायोग २०२६ के पावन एवं स्वर्णिम अवसर पर श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन बड़ा मंदिर, मालवीय मार्ग, रायपुर (छ.ग.) में विराजित तपोनिष्ठ, प्रासुक साधना के धनी प.पु. मुनि १०८ श्री आगम सागर जी महाराज, मुनि १०८ श्री पुनीत सागर जी महाराज, एलक १०५ श्री धैर्य सागर जी महाराज एवं एलक १०५ श्री स्वागत सागर जी महाराज ससंघ का मंगलमय सानिध्य इस समय संपूर्ण रायपुर की पावन धरा को आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर रहा है।

वर्षायोग समिति के कार्यकारी अध्यक्ष संजय नायक जैन एवं सचिव श्री राजेश रज्जन जैन ने हर्ष के साथ जानकारी देते हुए बताया कि आज दिनांक ४ नवम्बर २०२६ को प्रातः ८:०० बजे मूलनायक भगवान के समक्ष अत्यंत भक्ति-भाव, मंत्रोच्चार और जयकारों के साथ श्रीजी को पांडुकशिला में विराजमान किया गया। इस दौरान अभिषेक, शांतिधारा,आचार श्री पूजन किया गया। आज की रिद्धि सिद्धि सुख शांति प्रदाता शांति धारा करने का सौभाग्य श्रीमती कल्पना जैन, अखिल जैन शंकर नगर वालों को प्राप्त हुआ।

मुनिश्री पुनीत सागर जी महाराज ने अपनी ओजस्वी धार्मिक कक्षा में मोह और शरीर की नश्वरता पर अत्यंत गंभीर, मार्मिक और प्रेरणादायी उपदेश प्रदान किए। उन्होंने दिव्य दृष्टि देते हुए बताया कि "जिस प्रकार आँखों पर काला चश्मा आ जाने पर व्यक्ति सही पदार्थ को नहीं पहचान पाता, ठीक उसी प्रकार जिसका ज्ञान मोह से ग्रसित हो जाता है, वह जीवन के वास्तविक और परम सत्य के दर्शन कभी नहीं कर पाता।"


संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने शरीर से अगाध मोह होता है। मनुष्य जीवनभर चलते-चलते, घूम-फिरकर, खा-पीकर और सोकर अपनी अनमोल आयु व्यतीत कर देता है, जबकि परम सत्य यह है कि यह शरीर अंततः शरणहीन, अशुद्ध और विलीन होने वाला पुद्गल पिंड है। मुनिश्री ने शरीर की अवास्तविक सुंदरता की पोल खोलते हुए बताया कि केवल एक उंगली में ९६ रोग हो सकते हैं और पूरे शरीर में ५ करोड़ ९६ लाख रोग होने की असीम संभावनाएँ बनी रहती हैं। अतः इस नश्वर शरीर के प्रति अत्यधिक मोह का त्याग कर आत्म-साधना करना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है।

मुनिश्री आगम सागर जी महाराज के प्रवचन एवं 'छह ढाला' का गंभीर अध्ययन

मुनिश्री १०८ आगम सागर जी महाराज ने अपनी पावन कक्षा में अध्यात्म के महाग्रंथ 'छह ढाला' का गंभीर अध्ययन कराते हुए बारह भावनाओं को अपने जीवन में आत्मसात करने के महात्म्य पर विस्तृत प्रकाश डाला। बारह भावनाओं को पूर्ण निष्ठा से आत्मसात करने वाले जीव ही संसार से विरक्त होकर सच्चे वैराग्य को प्राप्त करते हैं। जिनके भीतर आत्मा का एकत्व भाव जागृत होता है, वे सुख-दुख को स्वयं भोगते हैं तथा भीतर की वास्तविक अनुभूति (संवेदन) भी स्वयमेव अनुभव करते हैं।

 जिस प्रकार दूध में पानी मिलने पर दोनों एकरूप प्रतीत होते हैं, वैसे ही शरीर के भीतर चैतन्य आत्मा निवास करती है, किंतु दोनों का स्वरूप और स्वभाव पूर्णतः भिन्न है। शरीर पुद्गल (जड़) है और आत्मा शुद्ध चेतन है।

मुनिश्री ने एक अत्यंत सुंदर कथा के माध्यम से समझाया कि एक व्यक्ति अपने शरीर के गहने उतारकर सामयिक करने बैठा और उन्हें अपने घुटनों के पास रख लिया। तभी एक चोर आया और वे गहने चुराकर ले गया। चोर ने वे गहने अपनी पत्नी को दिए और पत्नी ने उन्हें गिरवी रख दिया। बाद में वही चोर सेठ के पास गया और गिरवी रखे गहने वापस लेते हुए पैसे चुकाए। चोर ने जब उस सेठ को देखा तो पहचान गया और बोला कि यह सामान तो आपका ही है! इस पर सेठ ने अत्यंत वितरागी और ज्ञानी उत्तर देते हुए कहा— "जब तुम गहने ले गए थे, तब मैं सब कुछ छोड़कर ध्यान और सामयिक में बैठा था, उस समय ये गहने मेरे नहीं थे।" (यही दिगंबर संतों की दृष्टि में समता और वितराग भाव की पराकाष्ठा है। जिसका पुण्य से भला होना होता है, उसके मार्ग स्वतः प्रशस्त होते चले जाते हैं। अतः मनुष्य को व्रती (व्रतधारी) बनकर संतोषी बनना चाहिए और शरीर को पोषण भी केवल उतना ही देना चाहिए जितना जीवन की साधना और निर्वाह के लिए अत्यंत आवश्यक हो।

 आज प्रातः ९.३० बजे नवधा भक्ति के साथ पावन मुनि संघ को आहार-देने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस दौरान धर्माराधना में लीन पुण्यात्मा श्रावक-श्राविकाओं ने पूर्ण समर्पण, विनय और श्रद्धा के साथ संतों को आहार दान देकर अपने जीवन को धन्य बनाया जिसमें श्री पुष्पेंद्र जैन टैगोर नगर, श्रीमती सुनीला जैन एवं गणेशराम नगर ग्रुप रायपुर,श्रीमती पुष्पा देवी जैन, श्री बंशी लाल जी जैन को आहार देने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

इस संपूर्ण, भव्य एवं गरिमामयी आयोजन में दिगंबर जैन परंपरा के अनुसार समस्त धार्मिक अनुष्ठान पूरी पवित्रता के साथ संपन्न हुए, जिससे उपस्थित सभी श्रद्धालुओं को असीम आध्यात्मिक शांति, उल्लास और आत्मिक ऊर्जा की प्राप्ति हुई।

सूचनार्थ  - प्रणीत जैन (मीडिया प्रभारी)

वर्षायोग समिति एवं सकल दिगंबर जैन समाज, रायपुर 

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