रायपुर - जैन संत परंपरा के इतिहास में अद्वितीय संयोग एवं पावन बेला में राजधानी रायपुर की धर्मप्राण नगरी में आयोजित दो दिवसीय भव्य एवं ऐतिहासिक ‘शरदोत्सव वर्ष २०२६’ (गुरुद्वय अवतरण महापर्व) आज राजधानी के वी.आई.पी. रोड स्थित श्री राम मंदिर परिसर के श्री वाल्मीकि सभागार में अत्यंत हर्षोल्लास, भक्तिभाव और गरिमा के साथ संपन्न हुआ।
सकल दिगम्बर जैन समाज, रायपुर के अध्यक्ष श्री संजय नायक जैन एवं सचिव श्री राजेश रज्जन जैन ने बताया कि यह महामहोत्सव इस दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट और वंदनीय रहा क्योंकि इसी पावन तिथि शरद पूर्णिमा पर युगदीपक, समाधिस्थ राष्ट्रसंत आचार्य श्री १०८ विद्यासागर जी महाराज एवं वर्तमान परंपराचार्य आचार्य श्री १०८ समय सागर जी महाराज का एक ही पावन तिथि पर अवतरण दिवस (प्रकटोत्सव) है। गुरुद्वय के इस पावन अवतरण को समूचा जैन समाज 'गुरुद्वय अवतरण महापर्व' के रूप में मना रहा है।
यह महामहोत्सव संत शिरोमणि आचार्यद्वय के परम प्रभावक शिष्यों के असीम मंगल सानिध्य में संपन्न हुआ, जिसमें प. पू. मुनि १०८ श्री आगम सागर जी मुनिराज, प. पू. मुनि १०८ श्री पुनीत सागर जी मुनिराज, प. पू. ऐलक १०५ श्री धैर्य सागर जी महाराज एवं प. पू. ऐलक १०५ श्री स्वागत सागर जी महाराज की पावन उपस्थिति रही। संतों के सान्निध्य में आज के शरदोत्सव २०२६ कार्यक्रम की शुरुआत प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की स्तुति एवं श्री भक्तामर जी के संगीतमय मंगलपाठ से हुई। इसके पश्चात सभी जिनालयों के प्रमुखों ने आचार्यश्री के छायाचित्र के समक्ष दीप प्रज्वलन कर विधिवत कार्यक्रम का शुभारंभ किया। संपूर्ण रायपुर क्षेत्र जिनवाणी की स्वर लहरियों और गुरुभक्ति से आलोकित हो उठा।
आज का महामहोत्सव अत्यंत धार्मिक वातावरण और धूमधाम के साथ मनाया गया, जिसमें सभी कार्यक्रम निर्धारित समय पर प्रारंभ हुए। आज भक्तिभाव से विशेष अर्घ्य समर्पित किए गए, जिसमें भक्ति गीतों पर नाचते-गाते हुए नृत्य प्रतियोगिता के माध्यम से विभिन्न प्रतिभागियों ने अर्घ्य समर्पित किए।
प्रतियोगिता में दिगंबर जैन महिला मंडल राजनांदगांव ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। द्वितीय स्थान दिगंबर जैन महिला मंडल दुर्ग ने तथा तृतीय स्थान श्री आदिनाथ दिगंबर जैन महिला मंडल मालवीय रोड, रायपुर ने प्राप्त किया।
आरती सजाओ प्रतियोगिता में 80 से अधिक धर्मप्रेमियों ने बढ़-चढ़कर भाग लिया। कार्यक्रम के तहत 'पहले आओ' पुरस्कार योजना के अंतर्गत 20 भाग्यशाली विजेताओं को पुरस्कृत किया गया।
अकालरण समाहरोह के दौरान समाज के सेवाभावी और विशिष्ट योगदानकर्ताओं का गरिमामय अलंकरण समारोह संपन्न हुआ, जिसमें उनका बहुमान किया गया।
कार्यक्रम के मुख्य आकर्षण के रूप में पूज्य मुनिराजों के ओजस्वी एवं प्रेरणादायी मंगल प्रवचन हुए।
मुनि श्री आगम सागर जी महाराज ने अपने संस्मरण साझा करते हुए कहा कि उन्होंने गुरुवर को सबसे पहले वर्ष 1995 में देखा था जब वे उनके निवास क्षेत्र पधारे थे। वर्ष 1993 के चातुर्मास में जब उन्होंने गुरुवर के प्रवचन सुने, तो बस सुनते ही चले गए। गुरुजी का मन अत्यंत कोमल था और वे बहुत जल्द किसी भी बात पर विश्वास कर लेते थे। पूर्व जन्म के पुण्य के कारण उनका हृदय अत्यंत कोमल था। पूरी दुनिया अपने लिए जीती है, किंतु गुरुदेव ने संपूर्ण जगत और सभी जीवों के लिए जीवन जिया। गुरुवर ने ऐसा कोई क्षेत्र नहीं छोड़ा जिसके बारे में न सोचा हो—चाहे वह गौशाला हो, शिक्षा हो या चिकित्सा, उन्होंने हर ओर लोकहित का विचार किया। वे हमेशा देश, राष्ट्र और परोपकार की बात करते थे और उनकी सोच अत्यंत विराट थी। आज चंद्रमा की रोशनी में अमृत बरसता है, और ऐसे महान संतों ने इस धरा पर जन्म लेकर हम सभी को ज्ञान रूपी अमृत प्रदान किया है, जिससे हम सब धन्य हो गए हैं।
मुनि श्री पुनीत सागर जी महाराज ने अपने उद्बोधन में फरमाया कि गुरुवर का अवतरण दिवस और उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि जन्म की तिथि और कार्यशैली दोनों ही अलौकिक थीं। संभवतः पूर्वजन्म में भी इन महापुरषों ने जोड़ी बनाकर ही कार्य किए होंगे, जिसका फल आज हमें इस रूप में मिल रहा है। गुरुजी का अध्यात्मिक साहस अद्वितीय था, वे एक अंतर्यात्री महापुरुष थे। गर्भ काल से लेकर संलेखना तक उनका संपूर्ण जीवन आत्म-कल्याण और पर-कल्याण में ही समर्पित रहा। गुरुदेव ने छत्तीसगढ़ को बहुत कुछ दिया है, जिसमें डोंगरगढ़ का चंद्रगिरी तीर्थ स्थान प्रमुख है और अपने जीवन का अंतिम समय उन्होंने यहीं बिताकर सबसे बड़ा समाधि स्थल बनाया। सभी श्रावकों को पदयात्रा कर डोंगरगढ़ स्थित गुरुजी के समाधि स्थल के दर्शन अवश्य करने चाहिए। इसके साथ ही, हिंदी भाषा के उत्थान और प्रसार के लिए गुरुजी ने बहुत प्रयास किए हैं, जिस पर हम सभी को विशेष ध्यान देना आवश्यक है।
कार्यक्रम के दौरान दोपहर बाद कथक कलाकारों द्वारा आचार्यश्री के जीवनदर्शन पर आधारित भावपूर्ण नृत्य नाटिका ‘आत्मानुभूति’ प्रस्तुत की गई, जिसे देखकर उपस्थित जनसमूह भावविभोर हो गया। सायं ५:०० बजे सांध्यकालीन स्वामीवात्सल्य (प्रीतिभोज) का आयोजन हुआ, जिसमें हजारों धर्मप्रेमियों ने वात्सल्य भाव के साथ सहभोज का लाभ लिया। सायं ६:३० बजे प्रतियोगिताओं में सजी आरतियों के साथ भव्य महाआरती, भक्तिमय भजनों की गंगा और उल्लासपूर्ण डांडिया रास का आयोजन किया गया, जिसमें संपूर्ण सभागार भक्ति में सराबोर नजर आया। रात्रि ८:०० बजे कृतज्ञता ज्ञापन और आभार प्रदर्शन के साथ कार्यक्रम का मंगलाचरण समापन एवं विश्राम हुआ।
सकल दिगम्बर जैन समाज, रायपुर ने इस महामहोत्सव को सफल बनाने में सहयोग देने वाले समस्त आंचल के जैन एवं जैनेतर धर्मप्रेमी, श्रावक-श्राविकाओं एवं मीडिया कर्मियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया है।
सूचनादाता : प्रणीत जैन (मीडिया प्रभारी)
सकल दिगम्बर जैन समाज, रायपुर (छ.ग.)
19 Oct 2026