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रक्षाबंधन प्रेम, पवित्रता और मानवीय सुरक्षा का पर्व: राष्ट्रसंत ललितप्रभजी।

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रायपुर, 11 अगस्त। ‘‘रक्षाबंधन प्रेम, पवित्रता और मानवीय सुरक्षा का पर्व है। आओ हम सब इसका तहेदिल से स्वागत करें। यह वो पर्व है जब एक भाई अपनी बहन के लिए असीम प्रेम को लुटाता है, दुनिया में भाई-बहन के प्रेम के समकक्ष दुनिया में किसी की भी तुलना नहीं की जा सकती। बहन की अंतिम सांस तक यदि कोई काम आता है तो वह है उसका भाई। जब सब साथ छोड़ देते हैं, तब भी महिला के भीतर एक आश और विश्वास होता है कि मेरा भाई मेरा साथ निभाएगा। दुनिया में माँ जितना प्यारा एक और शब्द पैदा हुआ, माँ को तो माँ कहते हैं और माँ के भाई को मा-मा कहते हैं।’’ [video width="1920" height="1080" mp4="https://khabarchhattisgarh24.com/wp-content/uploads/2022/08/VID_20220811_103630.mp4"][/video] ये प्रेरक उद्गार राष्ट्रसंत महोपाध्याय श्रीललितप्रभ सागरजी महाराज ने आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में जारी दिव्य सत्संग जीने की कला के अंतर्गत धर्म सप्ताह के चतुर्थ दिवस गुरूवार को ‘प्रेम का पवित्र पर्वः रक्षाबंधन’ विषय पर व्यक्त किए। संतप्रवर ने आगे कहा कि यह रक्षाबंधन का त्यौहार ये केवल डोरी बांधने का त्यौहार नहीं, कोई हजार-पांच सौ का लिफाफा लेने-देने का त्यौहार नहीं, ये मानवीय भावना के सर्वोच्च परिणाम का त्यौहार है। नारी व नारी के बीच विशुद्धता, निर्मलता, प्रेममूलक भावना को पैदा करने वाला यह दिव्य पर्व है। हिमायू जैसे आततायी को भी जब पद्मावति के द्वारा लिफाफे में एक धागा भेजकर मैं तुम्हारे भाई बना रही हूं, मुझे तुम्हारी रक्षा की आवश्यकता है। तो कहते हैं बंगाल में रहने वाला हिमायू भी राखी की डोर का महत्व रखने राजस्थान तक आया था। जब भगवान श्रीकृष्ण ने जरासंध का वध करने के लिए अपने हाथ से जब सुदर्शन चक्र चलाया था, तब उनकी अंगुली से रक्तधार बह निकली, तब उनकी धर्मबहन मुंहबोली द्रोपदी पास बैठी थी, भरी राजसभा में खड़ी हो गई और अपने पल्लू को झट से फाड़कर श्रीकृष्ण की अंगुली पर बांध दिया। तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लाड़की छोटी बहन द्रोपदी से कहा था- हे कल्याणी मैं इस पल्लू के एक-एक धागे का मोल चुकाउंगा। यह भाई के द्वारा अपनी छोटी बहन को दिया गया वचन था। संकट के समय जब नारी का कोई काम नहीं आता तब उसका भाई काम आता है। ये हैं भाई-बहन के अमर प्रेम की कहानियां। नारी जाति का करें सम्मान। संतश्री ने कहा कि जब आप अपनी बहन से राखी का धागा बंधाते हैं तब केवल एक बहन को ही नहीं पूरी नारी जाति को यह वचन देते हैं कि मैं पूरी नारी जाति की इज्जत-सम्मान करूंगा, मैं नारी जाति की इज्जत का हमेशा विवेक रखुंगा। इसीलिए अगर आप चाहते हैं कि इस जग की हमारी सारी बहु-बेटियां सुरक्षित हों, तो उसके लिए पहली शर्त है आप औरों की बहन-बेटियों की इज्जत बचाने के लिए सदा आगे रहेंगे। रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत है प्रेम। संतप्रवर ने कहा कि यह राखी का त्यौहार परिवार में प्रेम और मिठास को घोलने के लिए आया है। हमेशा याद रखें, आदमी का धन रिश्तों की ताकत नहीं होता, आदमी की जमीन-जायजाद रिश्तों की ताकत नहीं होती, रिश्तों की सबसे बड़ी ताकत अगर कोई होती है तो वह परस्पर रहने वाला प्रेम होता है। मैं यहां बैठे हजारों लोगों से यह अनुरोध करूंगा कि आज रक्षाबंधन के दिन अपने मन को पवित्र-सकारात्मक बनाना और जिस किसी भी रिश्तेदार से आपकी बोलचाल बंद है, मेरी बातों पर भरोसा करके उनके घर जाना और साॅरी कह देना। साॅरी कहने का मतलब यह है कि आप रिश्तों का निभाना जानते हैं। रिश्तों को निभाने वाला घर में बड़ा होता है, रिश्ता और मटका-इसका महत्व वे ही लोग जानते हैं जो इसको बनाते हैं, इसको तोड़ने वाले कभी नहीं जान सकते। महान वे नहीं होते जो कंकड़ मारकर रिश्तों को तोड़ते हैं, महान वे होते हैं जो रिश्तों का सृजन कर उसकी अहमियत को समझते हैं। जो चंदन घिसता है वह मंदिर में भगवान की मूर्ति पर चढ़ने काम आता है और जो चंदन घिसता नहीं वह किसी अमीर के शव को श्मशान में जलाने के काम आता है। अगर आप घर में घिस रहे हैं तो आप अभिनंदन के पात्र हैं। किसी से अनबन हो तो उन्हें आज कहें साॅरी। संतश्री ने श्रद्धालुओं ने अनुरोध कर कहा कि अगर आपके घर में रिश्तों में जरा-सा भी तनाव है तो आज इस रक्षा पर्व पर एक काम करना ललितप्रभजी महाराज की झोली में एक गुरूदक्षिणा डाल देना, घर जाकर उनसे साॅरी कहकर उन्हें अपने गले लगा लेना, कह देना मुझे नहीं पता गलती मेरी थी कि आपकी थी, मुझे केवल समाधान निकालना है। ये राखी प्रेम, परिवार, पवित्रता का पर्व, सुरक्षा और मानवीयता का पर्व है, इस दिन यह संकल्प कर लेना मैं इस दिन से सदा के लिए अपने घर-परिवार में प्रेम और पवित्रता को ले आउंगा। परस्पर एक-दूसरे में मिठास कायम करें, एक-दूजे से मिला करें, आया-जाया करें। रिश्तों को अहमियत दीजिए, हमें हमेशा अपने-आपके प्रति सचेत रहना पड़ेगा। जरा सोचो तो सही- तुम जीने के लिए कमा रहे हो, या कमाने के लिए जी रहे हो। व्यस्त रहना यह बहुत अच्छी बात है पर अस्त-व्यस्त रहना यह जिंदगी की बहुत बड़ी जिल्लत है। तीसरा काम आज के दिन यह जरूर करो, यह संकल्प करो कि मैं अपने परिवार के लोगों के काम आउंगा। आप अपने पारिवारिक दायित्व को निभाइए, अगर आपका कोई पारिवारिक सदस्य आगे नहीं बढ़ पाया तो उसे आगे बढ़ने में सहयोग कीजिए। भक्ताम्बर स्तोत्र में आचार्यश्री मानतुंग ने कहा था कि दुनिया में सच्चा स्वामी वही होता है जो सेवक को भी एक दिन श्रीमान बना देता है। वास्तव में भगवान वही होता है जो भगत को भी एक दिन भगवान बना देता है। एक-दूसरे के मान-सम्मान व गौरव का रखें ख्याल। संतश्री ने कहा कि आज एक और संकल्प यह भी कर लो कि हम सब प्रेम, मिठास-माधुर्य से रहेंगे, एक-दूसरे के मान-सम्मान, गौरव का हमेशा ख्याल रखेंगे। छोटी-छोटी बातों में आपस में प्रेम-प्यार तोड़ने की बजाय केवल एक काम कर लो प्यार से छोटी-छोटी बातों को खत्म कर लो जिंदगी स्वर्ग बन जाएगी। परिवार में सुख का साधन बनाए रखने का यह एक मंत्र याद रखना- रात गई बात गई। रोज सुबह उठकर ये प्रार्थना किया करो कि हे भगवन् मेरे मन-विचार, वचन और कर्म से कभी किसी का बुरा न हो, सदा भला हो। हमेशा ये याद रखना कि दुखी आदमी तो कल सुखी हो सकता है, पर दूसरों को दुःख देने वाला कभी सुखी नहीं होता। एक-दूसरे के साथ प्रेमपूर्वक हिल-मिल कर रहेंः डाॅ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी। धर्मसभा के पूर्वार्ध में डाॅ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी ने कहा कि यह पर्व हमें प्रेमपूर्वक हिल-मिल कर साथ जीवन जीने के संदेश देते हैं। टूटकर जीना यह विकृति है, साथ में रहना यह प्रकृति है। और हिल-मिल कर जीना यही हमारी भारतीय संस्कृति है। हम साथ में हिल-मिल जुल कर बड़े प्रेम से रहते हैं यही हमारी सबसे बड़ी खासियत है। हो सकता है कोई आग लगाने आ जाये पर हमारी जिंदगी में तो हमेशा बाग लगाना ही होना चाहिए। सबसे प्रेम करना, हमारी प्रकृति में यही होना चाहिए। प्रेम के बदले प्रेम और नफरत के बदले नफरत लौटाना यह इंसान का कार्य होता है। लेकिन यदि कोई हमें नफरत करे उसे फिर भी वह उसे अपनी ओर से प्रेम लुटाए तो वह इंसान नहीं भगवान हुआ करता है। जो अपने जीवन में हमेशा नफरत घोलते हैं उनके जीवन में नर्क का ही निर्माण होता है, लेकिन जो अपने जीवन में हमेशा प्रेम व मिठास घोला करते हैं उनका तो हर रोज ही राखी और दिवाली हुआ करता है। आज के दिन पुरूष यह संकल्प लें कि वे हमेशा नारी जाति का सम्मान करेंगे और नारियां यह संकल्प लेवें कि वे अपने घर को हमेशा स्वर्ग बनाने का प्रयास करते रहेंगे। क्षय कायों की रक्षा का लें संकल्पः साध्वीश्री वसुंधराश्रीजी। साध्वीश्री वसुंधराश्रीजी महाराज साहब ने इस प्रसंग पर कहा कि राखी मात्र एक कच्चा धागा नहीं है, बल्कि प्रेम का प्रतीक है। इस प्रेम के प्रतीक लौकिक पर्व को हम बड़े खुशहाली के साथ मनाएं। यह पर्व हमें यह प्रेरणा भी देता है कि इस रक्षा के पर्व में हमें क्षयकायों की विराधना से बचने का संकल्प लेना है। उनकी हमें रक्षा करना है। बहनों ने राष्ट्रसंतों और ट्रस्ट मंडल को समर्पित की 35 फीट की विशाल राखी। बूढ़ापारा स्टेडियम में मनाया गया देश का सबसे बड़ा रक्षाबंधन महोत्सव। श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली, ट्रस्टीगण तिलोकचंद बरड़िया, राजेंद्र गोलछा व उज्जवल झाबक ने संयुक्त जानकारी देते बताया कि गुरुवार को भाई-बहन के पवित्र प्रेम के प्रतीक पर्व रक्षाबंधन के अवसर पर देश का सबसे बड़ा रक्षाबंधन महोत्सव मनाया गया। दिव्य सत्संग सभा के उपरांत राष्ट्रसंतों एवं ट्रस्ट मंडल को बहनों द्वारा 35 फीट की विशाल राखी समर्पित की गई। इस प्रसंग पर सभी उपस्थिति अतिथियों को श्रद्धेय संतश्री के हस्ते ज्ञानपुष्प स्वरूप धार्मिक साहित्य भेंट किये गये। कार्यक्रम का संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव पारस पारख ने किया। शुक्रवार का प्रवचन ‘कैसे कमाएं जीवन में दुआओं की दौलत’ विषय पर। दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, महासचिव पारस पारख, प्रशांत तालेड़ा, कोषाध्यक्ष अमित मुणोत व स्वागताध्यक्ष कमल भंसाली ने बताया कि शुक्रवार, 12 अगस्त को दिव्य सत्संग के अंतर्गत धर्म सप्ताह के पंचम दिवस ‘कैसे कमाएं जीवन में दुआओं की दौलत’ विषय पर प्रवचन होगा। श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट एवं दिव्य चातुर्मास समिति ने श्रद्धालुओं को चातुर्मास के सभी कार्यक्रमों व प्रवचन माला में भाग लेने का अनुरोध किया है।  

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