BREAKING

राग और द्वेष दोनों माेह के पुत्र है, इसका त्याग करोगे तो स्थिरता मिलेगी: साध्वी स्नेहयशाश्रीजी।

Share:

रायपुर। उपाध्याय यशोविजयजी ज्ञान सार के तीसरे अध्याय में बताते है कि पूर्णता को प्राप्त करने आपको मग्नता चाहिए और मग्नता प्राप्त करने के लिए आपको स्थिरता चाहिए। चौथे अध्याय में मोह के बारे में बताया गया है। हमें मोह का त्याग करना है। अगर मोक्ष में हमें कोई जाने नहीं देता है तो वह है माेह। यह बातें न्यू राजेंद्र नगर स्थित महावीर जिनालय में चल रहे भव्य आध्यात्मिक चातुर्मास के दौरान साध्वी स्नेहयशाश्रीजी ने बुधवार को कही। साध्वीजी कहती है कि माेह शराब के नशे की तरह होता है। जिसे मोह का नशा चढ़ता है, उसे किसी का भान नहीं दिखता, अच्छे बुरे का ज्ञान नहीं होता, वह होश में नहीं रहता है। हम पूरे दिन मैं और मेरा कहते रहते हैं। यह भी अहंकार का मोह है। एक दिन मैं शब्द का उपयोग मत करो और देखो। मैं का उपवास कर लो। मैं की जगह हमेशा मैंने कहो। मैंने बोला इसका मतलब मैं नहीं होता है। ऐसा करने से आपके अंदर का अहंकार गल जाएगा। मैं और मेरे के घेरे में पड़ कर यह संसार अंधा हो चुका है। वैसे आपको मोक्ष पाने के लिए बहुत बड़ा त्याग करने की जरूरत नहीं है। आप छोटे-छोटे त्याग कर सकते हो। राग और द्वेष को छोड़ो, यह दोनों मोह के ही बेटे हैं। पुण्य कम है और पाप ज्यादा, फैसला आप पर। साध्वीजी कहती है कि धर्म शास्त्र के अनुसार पुण्य नौ है और पाप अट्ठारह। दुख ज्यादा है और सुख कम। अगर सुख 23 घंटे रहेगा और दुख एक घंटा तो भी आपको 1 घंटे का दुख भारी पड़ेगा। एक घंटा भी अगर आप चैन की नींद सो जाते हो तो आप बहुत ही सुखद महसूस करोगे। वहीं, अगर रात को आपको नींद न आए तो एक-एक मिनट भी भारी पड़ता है। हमें यह जीवन जागने के लिए मिला है, अगर नहीं जागोगे तो यह व्यर्थ चला जाएगा। पिछले अध्याय में बताया गया था कि बिना कारण के कोई कार्य नहीं होता है। अगर आपको लगता है कि ऐसा नहीं होता तो यह हमारा अहंकार है, विडंबना है और यह सबसे बड़ा भ्रम है। पुण्य करोगे तो आपको अच्छा ही लगेगा। अगर आप खेल के मैदान में हो तो विपक्षी टीम आपका दोस्त हो या दुश्मन वह फुटबॉल को लात से ही मारेगा। वैसे ही वॉलीबॉल की बात करें तो आपके प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी चाहे वह सज्जन हो या दुर्जन वह बॉल को जमीन में गिरने नहीं देंगे। वैसे ही पुण्य का जब उदय काल चलता है तो दुश्मन भी आपके दोस्त बन जाते हैं। जब पाप का उदय काल चले तो दुश्मन क्या आपकी पत्नी और बच्चे भी आपको छोड़कर चले जाएंगे। कर्म सब जगह है। अगर आप गर्म बिगाड़ोगे तो आपको मोक्ष की प्राप्ति नहीं हो सकती है। कर्म हम से चिपकने के बाद ही राग और द्वेष के रूप में बदलता है और जब तक कर्म हमसे चिपकेंगे ही नहीं तो कोई हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता है। परमात्मा का पुण्य इतना प्रभावशाली होता है कि देवी-देवता भी उनके सेवा में लगे रहते हैं।पुण्य और पाप दोनों को हम ही बुलाते हैं। पूज्य और पाप दोनो को ही हम बुलाते है। अच्छा सोचो तो पुण्य का उदय होगा और बुरा सोचो तो पाप का उदय होता है। अपराध मन से होता है और गुनाह काया से। कोर्ट में अगर आप जाओ तो आपको वहां आपके गुनाहों की सजा मिलती है। आप अगर किसी के बारे में अपराधिक सोच रखते हो। किसी का बुरा सोचते हो या किसी का अहित सोचते हो तो आप को सजा नहीं होती है। पर धर्म सत्ता में ऐसा नहीं होता। परमात्मा के घर में अपराध की भी सजा मिलती है और यह सोच भी पाप की श्रेणी में आता है। एक चावल के दाने जितनी बड़ी तंदूली मछली, मगरमच्छ की आंख के भाव में बैठी रहती है। मगरमच्छ नदी के अंदर मुंह खोल कर बैठा रहता है। उसके सामने से मछलियां आना-जाना करती रहती है पर वह कुछ नहीं करता है। भव में बैठी मछली तंदूली सोचती है कि अगर इसकी जगह मैं होती तो सबको खा लेती। किसी को भी नहीं छोड़ती। साध्वीजी कहती है कि धर्मसत्ता में इस सोच को भी पाप कहा गया है। मन से सोचा गया किसी का अहित भी पाप की श्रेणी में आता है। बंद और मोक्ष दोनों का कारण का मन है। यहां फैसला आपको करना है कि आपको बंद होना है या फिर मोक्ष प्राप्त करना है। यहां मैं और मेरा बाहर की बात करता है बाहर से आप खुद को को मैं कहते हो। जबकि असम्य भाव में ऐसा नहीं होता। जब अहंकार पुकारे तो कहिए कि मैंने नहीं किया है। यह मैंने नहीं किया है यह तो आप लोगों के सहयोग से हुआ है। कोई दूसरा करें तो उसे क्रेडिट देने से आप कतराते हो और एक छोटे से काम को करने के बाद आप अपनी मैं का गुणगान करने लगते हो। मैं-मैं करते रहोगे तो लोगों के लिए आप फुटबॉल बन जाओगे। सबका धन्यवाद दोगे तो सब आपको वॉलीबॉल की तरह रखेंगे। साध्वीजी कहती है कि नीम का बीज लगाओगे तो आम का पेड़ नहीं होगा। चाहे आप कितना भी जाप कर लो लेकिन वहां नीम का पेड़ ही होगा। जब आप आम का बीज डालोगे तभी आम का पेड़ उगेगा। आप अपने आपको इतना बड़ा मत मानो कि आपको कोई झुका ना पाए। यह मोह है। मोह, शराबी की तरह होता है, उसे सत्य और असत्य का पता नहीं चलता। इसे छोड़ दो। माेह का त्याग करोगे तो स्थिर बनोगे। स्थिर बनोगे तो मग्नता आएगी और मग्नता से आप पूर्णता को प्राप्त कर सकोगे।

Share:

Popular News