रायपुर, 18 अगस्त। ‘‘हर धर्म की जड़ ध्यान हुआ करती है। अगर ध्यान हमारे जीवन में जुड़ा हुआ नहीं है तो धर्म-आराधना भी हम अच्छे ढंग से कर नहीं पाते। इसीलिए कहा गया है- जो भीतर गया वो भी तर गया। और जो भीतर नहीं गया वो डूब गया। अगर हमें अपने जीवन को तारना है तो उसके लिए हमें अपने भीतर उतरना ही होगा। ध्यान से बढ़कर धर्म का इस दुनिया में कोई और सरल मार्ग नहीं है। ध्यान एक ऐसा मार्ग है जिसमें करना कुछ नहीं होता, बस आंख बंद करके भीतर में ध्यान में डूबना होता है। इसीलिए ज्ञानियों ने कहा है कि सारे तीर्थों की यात्रा की लेकिन भीतर के तीर्थ की यात्रा न की तो तीर्थयात्रा करना भी अधूरी है। सारे मंदिरों में गए लेकिन इस भीतर के मंदिर में अगर ना गए तो सारे मंदिरों में जाना भी अधूरा रह जाता है। सबसे बड़ा मंदिर हमारा भीतर का मन और अन्तरहृदय है। भगवान श्रीमहावीर ने जब अपने जीवन में साधना व मुक्ति के मार्ग पर अपने कदम बढ़ाए तब से उन्होंने सबसे ज्यादा जिस तत्व व धर्म को जिया तो वह है ध्यान का धर्म। उन्होंने ध्यान को इतनी पराकाष्ठा के साथ जिया कि ध्यान करते-करते ही उन्हें परम ज्ञान हो गया। अगर अशांत मन को ठीक करने का कोई राजमार्ग है तो वह है ध्यान। ’’ ये प्रेरक उद्गार डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी महाराज ने आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में जारी दिव्य सत्संग जीने की कला के अंतर्गत अध्यात्म सप्ताह के चौथे दिन गुरूवार को ‘ध्यान और योग का कैसे आता है चमत्कारी परिणाम’ विषय पर व्यक्त किए। आज धर्मसभा में राष्टÑसंत श्रीललितप्रभ सागरजी एवं डॉ. मुनिश्री के सानिध्य में हजारों श्रद्धालुओं को ध्यान, योग एवं प्राणायाम के सरल अभ्यास कराए गए। राष्टÑसंत चंद्रप्रभ सागरजी रचित ध्यान की महत्ता प्रतिपादित करते अन्तरआत्मा से मुलाकात कराने वाले गीत ‘अपने हृदय में ऐसी ज्योति जलाइए, रौशन हो जाए जीवन अमृत हो जाए...’ से योग सत्र एवं धर्मसभा का शुभारंभ करते हुए डॉ. मुनिश्री शांतिप्रिय सागरजी ने कहा कि मेडिशिन से बचना चाहते हैं तो मेडिटेशन की ओर कदम बढ़ाइए। योग और ध्यान हमारे जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों के कल्याण के लिए है। अगर हम इसे समझते, सीखते और जीवन से जोड़ते हैं तो यह मानकर चलिए कि हमारे जीवन में विकास की वर्तमान रफ्तार अभी जितनी है, उसे हम सौ गुना और हजार गुना बढ़ा सकते हैं। भगवान श्रीमहावीर ने अपने शिष्यों को संबोधित करते हुए कहा था कि जैसे वृक्ष में जड़ मुख्य और महत्वपूर्ण होती है और शरीर में सिर महत्वपूर्ण हुआ करता है वैसे ही जीवन में सारे धर्मों में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण ध्यान हुआ करता है। मन की सारी समस्याओं का समाधान है ध्यान मुनिश्री ने कहा कि 2500 साल पहले भी जब इंसान का मन अशांत था, तो उससे ध्यान का प्रयोग कराया गया था। और अगर आज भी मन अशांत है तो हमें ध्यान का प्रयोग करना होगा। मन की सारी समस्याओं का समाधान एकमात्र ध्यान ही है। ध्यान की परम्परा का जन्म भारत में हुआ है और आज ध्यान का आनंद पूरे विश्व में लिया जा रहा है। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विरासत है योग और ध्यान का मार्ग। अक्सर हम सबका ध्यान रखते हैं लेकिन खुद का ध्यान रखना भूल जाया करते हैं। हमारी यह विचित्र अवस्था है कि हम बाहर भटकते रहते हैं, बाहर अपना समाधान खोजते हैं। लेकिन हमारे महापुरुष कहते हैं कि समाधान बाहर नहीं, समाधान तो हमारे भीतर है। सुख का स्रोत साधनों में नहीं हमारे भीतर है मुनिश्री ने बताया कि संसार में दो तरह की चीजें होती हैं- एक सुख के साधन और दूसरा सुख के स्रोत। हमारी सबसे बड़ी चूक यह है कि हम साधनों में ही सुख खोजते हैं और परिणाम यह आता है कि हमें सुख कभी नसीब नहीं होता है। सुख के साधन कितने ही बढ़ा लो-इक्ट्ठे कर लो, लेकिन फिर भी हमारा मन अतृप्त का अतृप्त ही बना रहता है। हमारे भारतीय मनीषियों ने हमें यह मंत्र दिया कि सुख बाहर नहीं है, सुख तो हमारे भीतर ही है। सुख का मूल स्रोत हमारे भीतर का आनंद है-सुकून है, जिसे यह मिल जाता है तो उसकी बाहर की भागा-दौड़ी सब शांत हो जाती है। जब परमात्मा अंदर है तो बाहर कितनी ही खोज कर लो, वह कभी मिलने वाला नहीं है। अगर हमें अपनी अन्तरआत्मा और परमात्मा के दर्शन करने हैं तो हमें ध्यान के मार्ग पर अपने कदम बढ़ाने ही होंगे। याद रखिएगा, अगर भारत की सबसे बड़ी देन कोई है तो वह है सुख के स्रोत की खोज। और सुख के स्रोत खोजने में अगर सबसे बड़ा योगदान है योग और ध्यान का। अगर आप मेडिशिन से बचना चाहते हैं तो जीवन में मेडिटेशन का मार्ग अपनाइए। सावधानी हटी-दुर्घटना घटी मुनिप्रवर ने विषयान्तर्गत आगे कहा- रसोई तैयार करते हुए हाथों में जलने-कटने के निशान बन जाते हैं, सेविंग करते हुए कभी कट लग जाता है, भोजन करते हुए कभी जीभ दांतों के बीच आ जाती है, चलते-चलते कभी रास्ते में ठोकर लग जाती है, पढ़ाई करते हुए भी परिणाम अच्छा न मिलना- इन सबका कारण है ध्यान चूक जाना। जब-जब हम ध्यान से चूकते हैं, तब-तब हमें विफलता हाथ लग जाती है। इसीलिए तो ये कहावत चल पड़ी कि सावधानी हटी-और दुर्घटना घटी। इसी सावधानी का नाम ही ध्यान है। व्यवहारिक जीवन में भी यदि हमें सफलता चाहिए तो भी हमें ध्यान के मार्ग पर कदम बढ़ाने होंगे और हमें अगर भीतर जगत में शांति चाहिए तो भी ध्यान के मार्ग पर बढ़ना होगा। सफलता का सूत्र है- एक काम और एक मन संतश्री ने कहा कि ध्यान केवल आंख बंद करने का ही नाम नहीं है, वरन् अपना हर काम ध्यानपूर्वक करना यह भी ध्यान कहलाया करता है। आंखें बंद करें तो भीतर का ध्यान करें और जब हम आंख खोलें तो अपना हर कार्य ध्यानपूर्वक संपन्न करें। जीवन में सफलता का सबसे बड़ा सूत्र है- एक काम और एक मन। एक काम में एक मन रहता है तो हमें सफलता मिलती है। जब एक काम अनेक मन हो जाता है तो है तो हमें विफलता मिल जाया करती है। एक काम और एक मन हमें कहीं से हासिल होता है वह हमें ध्यान से ही होता है। अगर हमें अहिंसा को अपने जीवन में लागू करना है तो भी हमें ध्यान को अपनाना होगा। अगर पाक शास्त्र-रसोई में निपुण होना हो, व्यापार में तरक्की करनी हो और हमें दुर्घटना से बचना है तो भी ध्यान को अपनाना होगा। दिमाग में भरे कचरे को खाली करने का सरल मार्ग है ध्यान संतश्री ने कहा कि अगर शरीर को स्वस्थ रखना है तो योग कीजिए, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ानी है तो प्राणायाम कीजिए और अगर मन की शांति पानी है तो ध्यान का अभ्यास कीजिए। छह घंटे नींद लेकर हमें जितनी ऊर्जा मिलती है, उतनी ही ऊर्जा हमें आधे घंटे के ध्यान से मिल जाया करती है। ध्यान इतना प्रभावी और लाभदायी है, फिर हमें ध्यान कठिन इस कारण से लगता है कि क्योंकि हमारे दिमाग में कचरा बहुत ज्यादा भरा हुआ होता है। हमारे दिमाग में कचरे का डेटा ज्यादा होता है, दुनियाभर की बातें हमारे दिमाग में घूमती रहती हैं और हकीकत यह है कि उसमें केवल 10 प्रतिशत ही काम की होती हैं और बाकी 90 प्रतिशत तो केवल कचरा होती है। ध्यान के नियमित अभ्यास से हमारे दिमाग में कचरे एकत्र नहीं होगा, हमें जितने विचारों की जरूरत है उतने ही हमारे दिमाग में रहेंगे। दिमाग में भरे हुए कचरे को खाली करने का सरल मार्ग है ध्यान। ध्यान के ये हैं लाभ मुनिश्री ने श्रद्धालुओं को ध्यान के लाभ से अवगत कराया। इनमें हैं- विचारों में कमी, रोगों का शमन होता है, सकारात्मकता बढ़नी शुरू हो जाती है, हमारी श्वांस धारा संतुलित होना शुरू हो जाती है, श्वांसो में तारतम्यता आती है, मानसिक शांति मिलती है, निर्णय क्षमता में वृद्धि, भय की ग्रंथी में कमी आती है, हम वर्तमान-जीवी बन जाते हैं, हमारी मानसिक थकान कम होनी शुरू हो जाती है, गहरी नींद आनी शुरू हो जाती है, भावनात्मक विकास, स्मरण शक्ति में वृद्धि, राग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और हमें जीते-जी मोक्ष और मुक्ति का स्वाद मिलना शुरू हो जाता है। ध्यान करते समय इन बातों का रखें ध्यान मुनिश्री ने बताया कि ध्यान में गहराई लाना चाहते हैं तो हमें हमेशा सात्विक आहार लेना चाहिए। ध्यान करने का स्थान शांत, शुद्ध-निर्मल व पवित्र हो, ध्यान का उत्तम समय ब्रह्म मुहूर्त का हो अर्थात् सूर्योदय से डेढ़ घंटे पहले जो समय शुरू होता है। ब्रह्म मुहूर्त में ध्यान के अभ्यास का अनंत गुना परिणाम व लाभ मिलना शुरू हो जाता है। ध्यान के लिए स्थिरता बनाए रखने के लिए पद्मासन या सिद्धासन में बैठें, यदि इन दो आसनों में भी आप नहीं बैठ पा रहे हों तो सुखासन में बैठें। ध्यान करते समय मुद्रा, ज्ञान मुद्रा होनी चाहिए, दूसरी मुद्रा भी ली जा सकती है वह है वीतराग मुद्रा। ध्यान हमें उतने समय तक करना चाहिए जितनी उम्र है उतने मिनट तक ध्यान किया जाना चाहिए, यानि की यदि 40 की उम्र है तो 40 मिनट तक ध्यान करें। यदि आप नव साधक हैं तो आपको 20 मिनट से ध्यान का अभ्यास शुरू करना चाहिए फिर ध्यान के समय को धीरे-धीरे बढ़ाते चले जाएं। हमारा वस्त्र का श्वेत रंग का हो या हल्के रंग वाला। ध्यान करते समय हमें पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख कर बैठना चाहिए। ध्यान के समय हमारी मुख मुद्रा शांत और प्रसन्नचित्त हो, कभी भी दांतों को भींचकर ध्यान का अभ्यास नहीं करना चाहिए। ध्यान में तीन चीजें अत्यंत आवश्यक होती हैं- वातावरण, विधि और निरंतरता। संबोधी धाम के ट्रस्टी व अतिथियों का हुआ बहुमान श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली, ट्रस्टीगण तिलोकचंद बरड़िया, राजेंद्र गोलछा व उज्जवल झाबक ने संयुक्त जानकारी देते बताया कि आज दिव्य सत्संग में आये संबोधि धाम जोधपुर ट्रस्ट के अध्यक्ष सुखराज मेहता उनकी धर्मपत्नी श्रीमती नीलम मेहता, संबोधि धाम के ट्रस्टी गिरीश भंडारी, श्रीमती सुधा भंडारी व महावीर कुम्भट चेन्नई का श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट व रायपुर श्रीसंघ की ओर से बहुमान किया गया। वहीं मंगलवार से प्रारंभ अक्षय निधि, समवशरण, विजय कसाय तप के एकासने के लाभार्थी कस्तूरचंद बुरड़ परिवार, प्रकाशचंद गोलछा परिवार, कन्हैयालाल डाकलिया परिवार, बुधवार के एकासने के लाभार्थी रोशनलाल संतोष नाहर परिवार, गौतमचंद संखलेचा परिवार, मांगीलालजी निम्माणी परिवार का भी बहुमान हुआ। सूचना सत्र का संचालन चातुर्मास समिति के महासचिव पारस पारख ने किया। 21 दिवसीय दादा गुरुदेव इक्तीसा जाप का श्रीजिनकुशल सूरि जैन दादाबाड़ी में सोमवार से प्रतिदिन रात्रि साढ़े 8 से साढ़े 9 बजे तक जारी है। आज के इक्तीसे का लाभ जयचंद टीकमचंद गौरवचंद छंगानी परिवार, कमलाबाई कन्हैयालाल डाकलिया परिवार खैरागढ़-रायपुर, ज्योत्सना बेन अनिल शाह परिवार, अशोक पटवा परिवार ने लिया । श्रीकृष्ण-राधा व राजुल-नेमी बने बच्चें होंगे प्रमुख आकर्षण आज का प्रवचन ‘एक घंटे में समझें आगमों और गीता का रहस्य’ दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरड़िया, महासचिव पारस पारख व प्रशांत तालेड़ा, कोषाध्यक्ष अमित मुणोत ने बताया कि शुक्रवार, 16 अगस्त को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ‘एक घंटे में समझें आगमों और गीता का रहस्य’ विषय पर विशेष प्रवचन होगा। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर नन्हे-मुन्ने बच्चे श्रीकृष्ण-राधा एवं राजुल-नेमी की वेशभूषा धारण कर आएंगे। साथ ही श्रीकृष्णजी का पालना सजाया जाएगा। खेमराज बैद प्रिंट मीडिया प्रभारी दिव्य चातुर्मास प्रचार-प्रसार समिति