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अद्भुत अक्टूबर ● बेमिसाल तोहफों से सज रही शाम, जैन टैलेंट मेगा शो आज।

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रायपुर - न्यू राजेंद्रनगर स्थित महावीर स्वामी जिनालय में 3 अक्टूबर से 9 अक्टूबर तक हर रात 8.30 बजे अद्भुत अक्टूबर का आयोजन किया जा रहा है। साध्वी स्नेहयशाश्रीजी की पावन निश्रा में बेमिसाल तोहफों से सजी खूबसूरत सी संध्या कार्यक्रम किया जा रहा है। यहां 3 अक्टूबर, सोमवार को मोस्ट टैलेंटेड देवरानी जेठानी, मंगलवार को निपुणा आराधक मंडल, न्यू राजेंद्र नगर की ओर से आओ खेल खेलें का आयोजन किया गया। वहीं, 5 अक्टूबर यानी बुधवार रात 8 बजे को जैन टैलेंट मेगा शो का आयोजन होगा, जिसमें गाना, वायलिन-गिटार, माउथ ऑर्गन, कविता, मिमिक्री, सोलो डांस, ग्रुप डांस, पेंटिंग की स्पर्धा होगी। साथ ही विजेताओं का चयन वोट के माध्यम से होगा और मोस्ट टैलेंटेड पर्सनालिटी अवार्ड 2022 दिया जाएगा। 6 अक्टूबर गुरुवार को व्हील ऑफ फार्च्यून का आयोजन होगा, जिसमें सामान्य क्विज़ होगा। 7 अक्टूबर शुक्रवार को खुल जा सिमसिम, 8 अक्टूबर शनिवार को फैमिली नंबर वन और 9 अक्टूबर रविवार को कौन बनेगा महाज्ञानी होगा जिसकी संयोजक डौंडी लोहारा ग्रुप की निशा लोढ़ा है। घर में कोई आपकी नहीं सुनता, तो आप बाहर उम्मीद कैसे रख सकते हैं: साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी। कई बार जो काम गुरु की उपस्थिति नहीं करा पाती है, वह काम गुरु के आशीर्वाद से ही हो जाता है। हर बार गुरु प्रत्यक्ष हो यह जरूरी नहीं है। गुरु पर आपकी आस्था होनी चाहिए। गुरु के प्रति आस्था, श्रद्धा और समर्पण नहीं हो, तो आपको आशीर्वाद भी नहीं मिल सकता है। आशीर्वाद के बिना जीवन में गुर का होना या नहीं होना एक बराबर है। गुरु का केवल ज्ञानवान होना आवश्यक नहीं है, गुरु के प्रति हमारे दिल में श्रद्धा का होना, आस्था का होना, समर्पण का होना आवश्यक है। यह बातें न्यू राजेंद्र नगर के मेघ-सीता भवन, महावीर स्वामी जिनालय परिसर में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान मंगलवार को साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी ने कही। अगर कुमार पाल राजा को गुरु नहीं मिले होते, तो 18 देशों में दया और प्रेम की बात नहीं हो सकती थी। आज तो यहां हमारा खुद के घर मे आधिपत्य नहीं है, किसी की अपने ही घर में नहीं चलती। आज की तारीख में कोई ऐसा बोल नहीं सकता कि मेरे घर में केवल मेरी ही चलती है और मेरे घरवाले मेरी बात मानते हैं। किसी के घर में किसी की नहीं चलती है। आपकी आपके घर में ही नहीं चलती और आप समाज, संस्था और व्यापार चलाने आते हो। फिर भी आप सोचते हो यहां मेरी ही चले। आपके पत्नी और आपके बच्चें भी आपके अनुसार नहीं चलते हैं। फिर सोचिए बाहर के लोग आपके हिसाब से कैसे चलेंगे। वहीं, 18 देशों के राजा, उनकी पुरे साम्राज्य में चलती थी। अपने घर में भी उन्हीं की चलती थी और बाहर में भी चलती थी। जो राजा कह दें, वह होता था और जिसे वे ना कह दे, वह चीज हरगिज नहीं होती थी। राजा अपने 11 लाख घोड़े और 84 हजार हाथियों को पानी छानकर पिलाने का आदेश देते थे, और वैसा ही किया जाता था। जबकि आप सोचिये आप अपना पानी भी छानकर नहीं पीते है। वहां लाखों घोड़ो और हाथियों को भी पानी छानकर पिलाया जाता था यहां हमारा खुद के ऊपर भी नियंत्रित नही है, तो हम कैसे दूसरों की बात कर सकते हैं। किसी का मारना तो दूर, मार शब्द का भी प्रयोग नहीं कर सकते आप। राजा कुमार पाल के शासन काल में कोई किसी को मार नहीं सकता था। मारना तो दूर की बात है, मार शब्द का प्रयोग भी नहीं कर सकता था। कार्य करना तो दूर, कार्य को क्रियान्वित करने वाले शब्द का उच्चारण भी उनके दरबार में नहीं हो सकता था। अपने घर के अंदर और बाहर में भी कोई मार शब्द नहीं कह सकता था। आज आप सुबह से लेकर शाम तक मार शब्द का उपयोग करते रहते हो। सुबह काम वाली बाई आ जाये तो उस कहते हो झाड़ू मार देना। रोज की दिनचर्या में ताला मार देना, मिस कॉल मार देना जैसे वाक्यों का प्रयोग करते रहते हो। ऐसा बोलकर हमारे परिणाम दया से कम होते जाते है। दया हमारे जीवन से घटती जाती है। जबकि हमारी दया बढ़नी चाहिए, हमारे अंदर दया का परिणाम बढ़ना चाहिए। इसीलिए कहा जाता है कि श्रावकों का जीवन दया का झरना है। साधु-संतों का जीवन और उनका हृदय प्रेम की नदी हैं और परमात्मा का अंत:करण करुणा का सागर है। फर्क देखिए एक झरना है, दूसरा नदी है और तीसरा सागर है। ऐसी साधना कुमार राजा ने की तो किसकी बदौलत, केवल गुरु के बदौलत की। समर्पण करना है तो प्रण लो कि चातुर्मास के इन चार महीनों में हमें कुमार पाल राजा जैसा बनना है, उनके जैसा कुछ करना है।

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