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अपनी डफली अपना राग अलाप रहे जिले के कांग्रेसी।

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                 रामकुमार टंडन

विधानसभा चुनाव का भ्रम लोकसभा में टूटा।

भूपेश बघेल की कार्यशैली पर जनता में विश्वास।

कवर्धा - मुख्यमंत्री के जनचौपाल भेंट मुलाकात कुकदुर पंडरिया कार्यक्रम के दौरान संगठन का जो तानाबाना देखने को मिला है, किसी से छुपाए नहीं छुप सकता है। जितने भी नेता इस क्षेत्र में हैं, उतनी ही गुटबाजी व खेमेबाजी में बटें हुए नजर आ रहे थे। यह बात प्रदेश के सरकार के मुखिया भूपेश बघेलजी को भी देखने और सुनने का अवसर प्राप्त हुआ है। संगठन में फेरबदल की बात चल रही है। संगठन की ढांचा को ठीक नही किया जाता है, तो निश्चित ही कांग्रेस पार्टी को आगामी 2023 की विधानसभा चुनाव में परिणाम भुगतना पड़ सकता है। गुटीय राजनीति में बटे सभी नेता अलग डफली अलग राग अलाप रहे हैं। भूपेश बघेल मुख्यमंत्री कांग्रेस की सरकार बनने के बाद पहली बार जनता से सीधे मुखातिब हो जानने समझने पहुंचे थे। जनता की उत्सुकता अपने मुखिया को नजदीक से देखने सुनने जिस तादात में भीड़ उमड़ी थी। उसे संगठन से जुड़े नेताओं ने व्यवस्था को इस कदर बिगाड़ रखे थे, कि मंच से ही मुख्यमंत्री को संबोधित करते समय हस्तक्षेप करना पड़ा था। सत्ता और संगठन दोनों की जोड़ी हल चलाने वाली बैल जोड़ी से तुलना की जा सकती है। उसमे से एक बैल को अलग कर दिया जाय तो हल चलाना मुश्किल है। यदि बैल के साथ भैंस की जोड़ी बनाकर हल चलाना भी बेमेंल जोड़ी है, इसे असंतुलन होता है जो अच्छा संकेत नहीं माना जाता है। जिले के दोनों विधानसभा के संगठन में कोई एकरूपता दिखाई नहीं दे रहा है। सत्ता की मलाई खाने में मसगुल हो जमीनी पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ ही सिनियरों को किनारे लगा दिया गया है, जिन्हे क्षेत्र की जनता जानती है। ऐसे में सत्ता और संगठन में संतुलन बनाए रखने की जरूरत है। पार्टी कार्यकर्ताओं से भेंट मुलाकात के दौरान मुखिया की चिंता संगठन के ढांचा पर भी विचार करना आवश्यक है। प्रशासन के लोगों के साथ अनुशासनात्मक कार्रवाई हो रही है। संगठन के जिम्मेदार नेताओं के ऊपर भी कार्रवाई होना चाहिए, ताकि नाराज़ पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर किया जा सके। चूंकि छत्तीसगढ़ में भाजपा की 15 वर्षीय सरकार ने जो गलती करी थी, उसका परिमाण प्रदेश की जनता और उनके पदाधिकारी कार्यकर्ता देख व भुगत रहे हैं। हालांकि कवर्धा व पंडरिया विधानसभा चुनाव का परिणाम का जो रिकार्ड है, उसे अपनी उपलब्धि मान रहे होंगे तो एक साल बाद लोकसभा चुनाव में सारा भ्रम टूट चुका है। जिला, जनपद, और नगरीय निकाय चुनाव भी जिले के लिए बहुत ज्यादा अच्छा नहीं है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कांग्रेस पार्टी को सत्ता प्राप्त हुई थी। असंतुलन के कारण ही वापस नही मिला था। 15 साल बनवास काटने के बाद कांग्रेस को सत्तासीन होने का अवसर प्राप्त हुआ है। इस लिहाज से भी संगठन की ढांचा को मजबूत करना अति आवश्यक है।

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