रायपुर - परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय योग तिलक सूरीश्वरजी महाराजा के शिष्य रत्न, श्री नाकोड़ा भैरव सोसाइटी में चातुर्मास कर रहे पूज्य मुनिराज श्री कंचन तिलक विजय जी महाराज समरादित्य कथा पर प्रवचन कर रहे है। पूज्य श्री ने बतलाया की इस शास्त्र की रचना पूज्य आचार्य भगवंत हरिभद्र सूरीश्वरजी महाराजा ने की है, और उन्होंने इसकी प्रस्ताव नाम में लिखा है। “दुषम काल के दोषों से दूषित, अनाथ जैसे हम जीवों को यदि जिन आग़म न मिलते तो हमारा क्या होता?” पूज्य श्री ने आगे बतलाया की धर्म कथा की भूमिका बनाते हुए हमें परमात्मा की चार आज्ञाओं का पालन करता है। उसमें से पहली आज्ञा है कि जो सुनने योग्य हैं हमें वही सुनना चाहिए - सुनने का अर्थ भावों में जाना, समझना होता है, इस संसार में मनुष्य,देवता एवं मोक्ष के सुख को देने वाले, प्रधान, गम्भीर अर्थ वाले ऐसे प्रतिष्ठित सर्वज्ञ जिनेंद्र परमात्मा के वचन ही सुनने के योग्य हैं, इसके अतिरिक्त संसार में कर्तव्य रूप सबकी बातें सुनना अलग है, पर सुनने की अभिलाषा तो सिर्फ़ जिन वचनों की ही होती है।
दूसरी आज्ञा - प्रशंसा योग्य जो है उसकी प्रशंसा करना है - परम तारक परमात्मा के मुख से जो रत्नत्रयी है, सम्यक् दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र यही प्रशंसा के योग्य है, बाक़ी का सब औचित्य है, अर्थात सम्पूर्ण विश्व में पंच परमेष्ठी ही प्रशंसनीय है, सम्यक् ज्ञान का अर्थ मैं आत्मा हूँ यह ज्ञान होना है। सम्यक् दर्शन का अर्थ है आत्मा को केंद्र में रखना और सम्यक् चरित्र का अर्थ आत्मा को केंद्र में रखकर जीवन जीना होता है।