चेन्नई, 14 जुलाई - विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने कहा - इस दुनिया में एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे सदा सदा दुख मिलता हो या सदा सदा सुख मिलता हो। जीवन में अनुकूलता भी है तो प्रतिकूलता भी है। दिन की रोशनी है तो रात का अंधेरा भी है। उन्होंने परमात्मा महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के दूसरे अध्ययन पर प्रवचन फरमाते हुए कहा- सुख दुख महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है उस स्थिति में हमारी मानसिकता। अपने चित्त में समाधि पाने के लिये जब भी दुख आये, उसे प्रसन्नता के साथ स्वीकार करो और जब भी सुख आये उसे उदासीनता के साथ स्वीकार करो दुख में पीड़ा और सुख में आनंद का अनुभव करने वाला व्यक्ति भविष्य में अपने लिये दुख प्राप्त करने का आयोजन करता है। उन्होंने परमात्मा महावीर का उदाहरण देते हुए कहा- प्रभु महावीर के प्रारंभिक जीवन में उन्हें बहुत कष्ट मिले, पर उन्होंने परम स्वस्थता और प्रसन्नता के साथ उसे स्वीकार किया। केवलज्ञान की प्राप्ति के पश्चात् उन्हें चारों ओर से अपार वैभव मिला करोडों देव देवियाँ उनके चरणों में रहते। राजा महाराजा और हजारों लोग उनकी सेवा में रहते इस सुख को उन्होंने पूर्ण उदासीनता के साथ स्वीकार किया। यही मोक्ष का मार्ग है। उन्होंने सूत्र देते हुए कहा- यदि आप अपने शरीर को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो आहार विवेक पर ध्यान दीजिये योग्य आहार आपको स्वस्थ बनाता है, और अयोग्य आहार आपको अस्वस्थ करता है। यदि आप अपने मन को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो विचार विवेक पर ध्यान दीजिये कुत्सित, विकारयुक्त विचार आपके मन को बीमार करते हैं। और यदि आप अपनी चेतना को स्वस्थ रखना चाहते हैं, तो दृष्टि विवेक पर ध्यान दीजिये। दृष्टि की पवित्रता और निर्मलता आपकी आत्मा को शुद्ध बनायेगी। उन्होंने कहा- साधना जैसे को तैसा के नियम के आधार पर नहीं चलती। सामने वाला क्या करता है, क्या कहता है, मेरी भाषा या मेरे व्यवहार का निर्माण उस पर नहीं होगा। मेरा व्यवहार मेरे आधार पर होगा। उसका व्यवहार उसके आधार पर होगा। उन्होंने कहा- हम गुलामी की जिन्दगी जीते हैं। कोई अपमान करता है, तो क्रोध में आता है। कोई सम्मान करता है तो मान करने लगते हैं। यह तो गुलामी हुई। मेरे भाव मेरे हाथों में नहीं रहे सामने वाले ने जो चाहा, जैसा चाहा, मुझसे करवा दिया। आचार्यश्री ने कहा- तुम सबको सुखी नहीं बना सकते। पर एक संकल्प सभी को लेना चाहिये कि मैं अपनी भाषा, अपने व्यवहार, अपने विचार, अपने दृष्टिकोण से किसी भी व्यक्ति को दुखी नहीं करूँगा। उन्होंने कहा - हर व्यक्ति दूसरों से सहयोग पाना चाहता है, पर उसे यह चिंतन करना है कि मैं स्वयं दूसरों का कितना सहयोग करता हूँ। परमात्मा महावीर की वाणी को अपने शब्दों में पिरोकर आचार्य उमास्वाति भगवंत ने तत्वार्थ सूत्र में कहा है- परस्परोपग्रहो जीवानाम्! अर्थात् हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से उपकृत है। हमारा पूरा जीवन उपकार का जीवन है। पानी हमारी प्यास बुझाकर हम पर उपकार करते हैं। वनस्पति हमारी क्षुधा को शांत करके उपकार करते हैं। वायु हमें जीवन देकर उपकार करता है। उन्होंने कहा- हमारा कर्त्तव्य है कि किसी भी प्राणी को हमारे द्वारा किसी भी प्रकार का कोई कष्ट न हो। उन्होंने सिद्धि तप के व सौभाग्य कल्पवृक्ष तप के तपस्वियों की शाता पूछी। ट्रस्ट के महामंत्री पदम टाटिया ने बताया कि कल शनिवार को पूज्यश्री प्रवचन में लोगों की शंकाओं का समाधान करेंगे।