श्री हीरसुरी आराधना भवन, भैरव सोसाइटी रायपुर में आत्महित वर्षावास के अंतर्गत पूज्य मुनिराज श्री कंचन तिलक विजयजी महाराजा ने समरादित्य कथा पर प्रवचन माला के अंतर्गत बतलाया की कथा 4 प्रकार की होती है पहली अर्थ कथा, दूसरी काम कथा, तीसरी धर्मकथा, और चौथी संकीर्ण कथा. धर्मकथा का उद्देश्य अपने भीतर के उपादान को प्रकट करना होता है. यह दोषों को दूर करके अपनी आत्मा के गुणों को प्रकट करती है. आत्मा के गुणों का वर्णन करते हुए पूज्य श्री ने 10 प्रकार के यति धर्मो के बारे में बतलाया. पहला क्षमा-, क्षमा आत्मा का स्वभाव है जबकि क्रोध आत्मा की विभाव दशा है. दूसरा नम्रता - हम परमात्मा या गुरु को वंदन करते हैं तो वह वंदन अहंकार को निकालने के लिए करते हैं या बग़ैर सोचे? वंदन विनय का प्रतीक है. अहंकार आत्मा का दोष है. तीसरा- सरलता. माया, छल, कपट आदि दोषों को दूर कर सरलता नामक गुण को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए.