रायपुर - जंबूस्वामी की जिज्ञासा के उत्तर में सुधर्मा स्वामी ने एक अनूठे स्तोत्र पुच्छिंसुणं (वीर स्तुति) की रचना की, जिसकी आराधना लालगंगा पटवा भवन में जारी है। उपाध्याय प्रवर ने शनिवार को कहा कि पुच्छिंसुणं की 6 गाथा (स्तोत्र 9 से 14) के मूल सूत्र को ध्यान में रखोगे तो जीवन में नई यात्रा के लिए पथ खुलेगा। ये स्तोत्र हमारे अंदर के महावीर को जगाने के स्तोत्र है। और हम अपने अंदर के महावीर को क्यों नहीं जगा पा रहे हैं उसका उत्तर है। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि वीर्य है तो ख़ुशी है और ख़ुशी है तो वीर्य है। जिस काम को करने में आनंद आता है उस काम को करने से शक्ति का जागरण होता है। जिस काम को करने से आनंद नहीं आता है, उसमे शक्ति कम होती जाती है। जिस काम को करना है उसमे पूरी शक्ति लगा दो। परमात्मा जो भी कार्य करते थे उसमे अपनी पूरी शक्ति लगा देते थे। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि प्रभु महावीर जो भी कार्य करते थे उसमे अपनी पूरी शक्ति लगा देते थे। जब महावीर अपनी साधना काल में थे, तब उन्होंने एक रात्रि की प्रतिमा धारण की और मन में एक विचार आया कि आज मुझे रात भर एक छोटे से कंकर को देखना है, बिना पलक झपकाए। इस प्रतिमा की जैसे शुरुआत हुई उनके अंदर शक्ति का विस्फोट हुआ। और इस शक्ति का स्पंदन स्वर्ग में बैठे शक्रेन्द्र को हुआ। उन्हें साधना के स्पंदन महसूस हुए। शक्रेन्द्र ने इस स्पंदन की ओर ध्यान दिया तो उसने देखा कि परमात्मा ने अद्भुत साधना शुरू की है, और वह उनकी भक्ति में लीन हो गया। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि कुछ लोग भक्ति में खुश होते है, कुछ स्वयं भक्ति नहीं कर पाते लेकिन दूसरों की भक्ति देखकर उन्हें आनंद आता है। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो भक्ति भी नहीं करते हैं और दूसरों की भक्ति भी उन्हें नहीं सुहाती है। शक्रेन्द्र की सभा में भी कुछ देव थे जिन्हे महावीर की प्रशंसा नहीं सुहाती थी। एक ने कहा कि आप क्या कर रहे हैं? शक्रेन्द्र तो भक्ति में डूबा हुआ था, उसने कहा कि मेरे परमात्मा ने आज अनूठी साधना शुरू की है, रात भर एक कंकर को बिना पलक झपकाए देखने की साधना शुरू की है। देव ने कहा कि यह सोचना अलग बात है, कोई बिना पलक झपकाए नहीं रह सकता। शक्रेन्द्र ने कहा कि परमात्मा की पलक कोई झपका नहीं सकता। देव ने कहा कि मैं झपका के बताता हूँ। उसने कई प्रयास किए, चक्रवात चलाया, धूल भारी आंधी चलाई, एक रात में अनेक उपक्रम किए, लेकिन महावीर की पलक नहीं झपका पाया। इसे कहते हैं पडिपूर्ण वीर्य।