हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 16 अगस्त 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य राष्ट्ररत्न, खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में परिवार, संबंधों की गरिमा, संस्कार और जीवन में मर्यादा की आवश्यकता पर प्रकाश डाला।
गुरुदेवश्री ने विषय की संवेदनशीलता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रत्येक परिवार और समाज को प्रभावित करने वाला विषय है। परिवार की पवित्रता, संबंधों की गरिमा और घर की शांति जिन मूल्यों पर टिकी है, उन पर आज गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। समय बदल गया है। पहले मर्यादा, अनुशासन और पारस्परिक विश्वास जीवन का आधार हुआ करते थे। आज मोबाइल और बदलता सामाजिक वातावरण हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे हैं, लेकिन यदि संस्कार और संकल्प दृढ़ हों, तो कोई भी बाहरी वातावरण हमें अपनी दिशा से विचलित नहीं कर सकता।
आज का विषय है—“बेटी, जरा संभलकर।” बेटी और बेटा दोनों समान हैं, लेकिन बेटियों के संदर्भ में कुछ विशेष सावधानियों पर विचार करना आवश्यक है। जीवन एक गाड़ी के समान है। उसमें स्टेयरिंग, गियर और एक्सीलेटर सभी आवश्यक हैं, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण है ब्रेक सिस्टम। एक्सीलेटर गति देता है और ब्रेक उस गति को नियंत्रित करता है। इसी प्रकार जीवन में आगे बढ़ने की गति के साथ मर्यादा और संयम भी आवश्यक हैं। रेड सिग्नल हमें रोकता जरूर है, लेकिन वही हमारी सुरक्षा भी करता है।
जीवन में लक्ष्मण रेखा जरूरी है। रामायण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए आचार्यश्री ने बताया कि रावण मायावी रूप धारण करके आया था। आज भी जीवन में अनेक प्रकार के मायावी आकर्षण अलग-अलग रूपों में हमारे सामने आते हैं। ऐसे में बेटियों को अपनी मर्यादा की रेखा स्वयं निर्धारित करनी होगी और यह समझना होगा कि कौन-सी सीमा उनके सम्मान, सुरक्षा और संस्कारों की रक्षा करती है।
पूज्य गुरुदेव श्री ने कहा कि माता-पिता की डाँट भी कई बार पतन से बचाने वाली होती है। “जिनसे भय लगता है, उनसे प्रेम मत करो, लेकिन जिनसे प्रेम करते हो, उनसे अवश्य भय करो।” यह भय व्यक्ति या संबंध का नहीं, बल्कि गलत कार्य से रोकने वाली मर्यादा का भय होना चाहिए। अभिभावकों के लिए यह समझना आवश्यक है कि बच्चों को केवल धन और सुविधाएँ देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें समय, प्रेम, अपनापन, संवाद और संस्कार भी चाहिए।
उन्होंने कहा की तेरह से अठारह वर्ष की उम्र बच्चों के जीवन का अत्यंत संवेदनशील चरण है। इस अवस्था में माता-पिता को बच्चों पर केवल नियंत्रण रखने के बजाय उनका मित्र बनना चाहिए, उनकी भावनाओं को समझना चाहिए और उनके साथ खुलकर संवाद करना चाहिए। जब बच्चों को अपने मन की बात घर में कहने का विश्वास मिलता है, तो वे बाहरी आकर्षणों और गलत संगति से स्वयं को अधिक सुरक्षित रख पाते हैं।
मोबाइल आज जीवन की आवश्यकता बन चुका है, लेकिन घर में इतनी मर्यादा अवश्य होनी चाहिए कि माता-पिता जब चाहें, बच्चे बिना किसी संकोच के अपना मोबाइल उन्हें दे सकें। आवश्यकता मोबाइल छोड़ने की नहीं, बल्कि उसके उपयोग की मर्यादा तय करने की है। अपनी लक्ष्मण रेखा स्वयं निर्धारित करें, मर्यादा और संस्कारों को जीवन का आधार बनाएँ तथा अपनी पवित्रता, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य की रक्षा करें।