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धर्म हमें विनय कुशल बनाता है - मुनिश्री सुधाकर

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श्री लालगंगा पटवा भवन में चातुर्मास हेतु विराजित है मुनिश्री।

रायपुर - रायपुर स्थित श्री लाल गंगा पटवा भवन में चातुर्मास हेतु प्रवासरत आचार्य श्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनिश्री सुधाकर जी व मुनिश्री नरेश कुमार जी के सान्निध्य में गतिमान आत्मकल्याण कारी प्रवचन श्रृंखला अंतर्गत आज दिनांक 25/07/2024 को मुनिश्री ने विशेष रूप से जैन धर्म की लगभग दोनों अर्थात श्वेताम्बर व दिगम्बर मान्यताओं में भगवान की वाणी अर्थात आगम आधारित शाश्वत पाठ/मंत्र "नमोत्थुणं" पर विस्तार से उपस्थित धर्मसभा को मार्गदर्शीत करने का प्रयास किया।


सर्वप्रथम मुनिश्री नरेश कुमार जी ने 'नमन' की भावना से ओत-प्रोत गीतिका का संगान व कथानक वाचन से इसे परिभाषित किया तत्पश्चात मुनिश्री सुधाकर जी ने फ़रमाया कि नमोत्थुणं का अर्थ होता है विनम्रतापूर्वक नमन करना। नमन अर्थात झुकना। जो झुकता है वह जीव अर्थात प्राणवान है और जो झुकता नहीं वह निर्जीव अर्थात मुर्दा है क्योंकि जो झुकना जानता है वह ग्रहण करने का पात्र होता है, अपने लक्षित मंजिल को प्राप्त कर सकता है। नमोत्थुणं के पाठ में अरिहंत भगवान को नमन किया गया है। भगवान वह होते हैं जिन्होंने राग-द्वेष पर विजय प्राप्त कर ली है। भगवान बनने वाली आत्मा अपने जीवनकाल में 6 प्रकार के दान देती है। भगवान बनने वाली आत्मा अपने जीवनकाल में दीक्षा से लेकर कैवल्य ज्ञान प्राप्ति तक मौन साधना करती है क्योंकि कि भगवान सुनी सुनाई बातों पर कथन नहीं करते नहीं उपदेश देते है। दीक्षा लेते ही उन्हे मन:पर्यव ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है। अरिहंत भगवान बनने वाली आत्मा हमें प्रेरणा देती है कि जब तक सफलता प्राप्त नहीं होती हमें कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि कि कुछ पाने के लिए पुरुषार्थ करना ही पड़ेगा।


मुनि वृंद के सान्निध्य में उनकी पावन प्रेरणा से तपस्याओं का भी अच्छा क्रम  चल रहा है। आगामी रविवार को मुनि वृंद के सान्निध्य में "पंचऋषी अनुष्ठान" का आयोजन किया गया है।

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