सूरत - सूरत नगर में चितलवाना निवासी श्री भरतकुमार गांधी व बडौदा निवासी श्री जैनम्कुमार संचेती की भागवती दीक्षा ता. 19 जुलाई को पूज्य गुरुदेव युग दिवाकर अवंति तीर्थोद्धारक खरतरगच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा., पूज्य गणिवर्य श्री मयंकप्रभसागरजी म. पूज्य उपाध्याय श्री मनितप्रभसागरजी म. पूज्य गणिवर्य श्री मेहुलप्रभसागरजी म. आदि ठाणा 15 की पावन निश्रा तथा पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म.सा. पूजनीया बहिन म. डॉ. श्री विद्युत्प्रभाश्रीजी म. पूजनीया डॉ. साध्वी श्री नीलांजनाश्रीजी म. आदि ठाणा 11 तथा पूजनीया साध्वी श्री मधुरिमाश्रीजी म. आदि ठाणा 4 के पावन सानिध्य में अत्यन्त भावोल्लास भरे वातावरण में संपन्न हुई। दीक्षा समारोह का प्रारंभ ता. 17 जुलाई को केसरिया रंगोत्सव के साथ हुआ। पूज्य गुरुदेवश्री ने मुहपत्ति पर केसर से नंद्यावर्त बनाया। मामा परिवार की ओर से मामेरा किया गया। सकल श्री संघों द्वारा बहुमान अभिनंदन किया गया।
रात्रि में भक्ति का आयोजन किया गया।
ता. 18 जुलाई को वर्षीदान का भव्य वरघोडा आयोजित किया गया। कुशल वाटिका से प्रारंभ यह वरघोडा पाल के मुख्य मार्गों से होता हुआ संघशास्तापुरम् के भव्य प्रवचन सभागृह में पहुँचा। मुमुक्षु द्वय की ऐतिहासिक भव्य शाही एण्ट्री हुई। पूज्यश्री का मंगल प्रवचन हुआ। शाम चार बजे अंतिम वायणा संपन्न हुआ। रात्रि में विदाई समारोह का भव्य आयोजन हुआ। मुमुक्षुओं के उद्गार सुनकर लोगों की आंखों से अश्रु बहने लगे। संघवी जेठमलजी मिश्रीमलजी मरडीया परिवार सांचोर वालों ने विजय तिलक का लाभ लिया।
देववंदन आदि समस्त विधि विधानों के पश्चात् पूज्य गुरुदेवश्री ने उपकरणों को अभिमंत्रित किया। मुमुक्षुओं ने गुरुपूजन किया। अपने माता पिता आदि वृद्धजनों का आशीर्वाद लिया। बाद में शुभ मुहूर्त आने पर पूज्यश्री ने मुमुक्षुओं को अभिमंत्रित रजोहरण प्रदान किया। जिस रजोहरण प्राप्त करने की वर्षों की झंखना थी, उसे आज साकार होते देखकर मुमुक्षु द्वय हर्ष के आंसु बहाने लगे। नृत्य द्वारा अपने अन्तर के भावोल्लास को प्रकट किया। परमात्मा की तीन प्रदक्षिणा देकर वस्त्र परिवर्तन हेतु प्रस्थान किया।
दीक्षा महामहोत्सव को निहारने हजारों लोग उमड पडे थे। विशाल पाण्डाल भी छोटा पड गया था। साधुवेश में पधारे दोनों नूतन मुनियों को निहार कर लोग धन्यता का अनुभव करने लगे। पूज्य गुरुदेवश्री ने उनके केशों का लुंचन किया। करेमि भंते सूत्र द्वारा यावज्जीव साधुता के प्रत्याख्यान करवाये। दोनों मुनियों को कमशः मुनि मुखरप्रभसागर व मुनि मधुरप्रभसागर नाम दिये। उपस्थित विशाल जन समूह ने अक्षतों से बधाया।