सूरत, 4 अगस्त - श्री कुशल कान्ति खरतरगच्छ जैन संघ के तत्वावधान में पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म. ठाणा 17 एवं पूजनीया माताजी म. श्री रतनमालाश्रीजी म. बहिनम. डॉ. विद्युत्प्रभाश्रीजी म.सा. ठाणा 8 कुल 25 साधु साध्वियों के चल रहे ऐतिहासिक चातुर्मासके अवसर पर श्री संघ शास्ता पुरम् में विशाल धर्मसभा को संबोधत करते हुए आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने कहा - जीवन में शान्ति का अनुभव करना, हमारा लक्ष्य होना चाहिये। परन्तु वही व्यक्ति शांतिप्राप्त करने का अधिकारी है, जो सदा सर्वदा अपने आचरण, व्यवहार, वाणी से दूसरों को शान्ति प्रदान करता है। जो व्यक्ति दूसरों को अशान्त करता है, उनकी अशान्ति में निमित्त बनता है, अपनी भाषा व व्यवहार से दूसरों के जीवन में जहर घोलता है, वह व्यक्ति शांति प्राप्त करने का अधिकारी नहीं है।
उन्होंने कहा - कैंची एक को दो करने का काम करती है। और सुईदो को एक करने का काम करती है। हमें अपने जीवन का व्यवहार कैंची की तरह नहीं, अपितु सुई जैसा करना है।
उन्होंने कहा-वही घर स्वर्ग है, जहाँ रहने वाले लोग एकदूसरे के सुखमें सुखी औरदुः खमें दुःखी हुआ करते हैं। जहाँ केवल और केवल स्वयं का स्वार्थ हो... जहाँ अपने सुख के लिये दूसरों को दुःख देने में संकोच का अनुभव नहीं हो, वह घर नहीं अपितु नरक है।
उन्होंने कहा-घर में झगडा करके यदि कोई व्यक्ति मंदिर जाता है, तो वहाँ वह परमात्मा के दर्शन कैसे कर पायेगा! उसके दिमाग में तो मंदिर में भी घर की ही फिल्म घूमेगी। इसलिये शान्ति सबसे पहले घर में चाहिये।
उन्होंने कहा-महिलाओं पर घर की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी है। वे चाहे तो घर को स्वर्ग बना दे और चाहे तो नरक बना दे। उन्होंने महिलाओं को संबोधित करते हुए कहा- मेरी बहिनों! आपके कारण कोई घर टूटना नहीं चाहिये। इस बात की आपको शपथ लेनी है। थोडा दुःख उठा लेंगे। थोडी बातें सहन कर लेंगे। पर घर टूटने नहीं देंगे, यह संकल्प करना है।
हम भारतीय संस्कृति से दिनों दिन दूर होते जा रहे हैं तथा पाश्चात्य संस्कृति का लगातार हमारे घर में प्रवेश हो रहा है। और यही परिवार के टूटने का कारण है। उन्होंने कहा - भारतीय संस्कृति में परिवार की पूर्णता है। यहाँ परिवार के हर संबंध के लिये अलग संबोधन है। पिताजी के बडे भाई को ताउजी तो छोटे भाई को चाचाजी कहा जाता है। मां के भाई को मामा तो पिता की बहिन को भूआ कहा जाता है। जबकि अंग्रेजी कल्चर में हर संबंध के लिये एक ही अंकल शब्द है। वहाँ परिवार की पूर्णता नहीं है।
उन्होंने कहा - परिवार का अर्थ पति, पत्नी और बच्चे ही नहीं होता। परिवार का संबंध दादा, दादी, माता पिता के साथ संयुक्त रहने में है। आज स्वतंत्रता का युग है। पूर्व समय में दादीजी की गोद में बैठकर पोता आदर्श कथाऐं सुनता, संस्कारी घटनाऐं सुनता और अपने जीवन का निर्माण करता। आज दादी की गोद कहॉ! और मां के पास फुर्सत कहाँ ! तो संस्कार कहाँ से मिलेंगे। उन्होंने कहा - अपनी आत्मकेन्द्रित स्वार्थ पूर्ण प्रवृत्ति का त्याग कर समष्टि के बारे में सोचना जरूरी है। मात्र अपने लिये नहीं, पूरे परिवार के लिये समझना जरूरी है। और वहीं शान्ति है, वहीं ईश्वरत्व का निवास है।
उन्होंने कहा - जीवन में यदि किसी का मूल्य आंकना है तो अपना मूल्य आंको। स्वयं के मूल्य से बढकर इस दुनिया में और किसी पदार्थ का मूल्य नहीं है। जो स्वयं को पा लेता है, वह सबको पा लेता है। फिर कुछ भी पाना उसके लिये शेष नहीं रहता।
जो व्यक्ति सवयं को खोकर जगत का सारा ऐश्वर्य और वैभवपा ले, तब भी वह अपूर्ण और अधूरा है। परंतु जिसके पास कुछ भी नहीं है। परंतु आत्म धुनएवं आत्म ज्ञान है, निश्चित ही वह सबसे बडा अमीर और समृद्ध है।
दोपहर में संस्कार शिविर में प्रवचन करते हुए उपाध्याय मनितप्रभसागर ने कहा - हमें जीवनका पूर्ण उपयोग करना है। एकभी पैसा आदमी व्यर्थ नहीं खोता, ऐसे ही हमें अपने जीवन के संबंध में विचारना चाहिये। धमतरी, अक्कलकुआ, नंदुरबार, इन्दौर आदि क्षेत्रों से पधारे अतिथियों का बहुमान किया गया।