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अपने मन को शांत करने का श्रेष्ठ माध्यम है ध्यान : - श्री विशुद्ध सागर जी मसा

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धमतरी - युवा संत परम पूज्य श्री विशुद्ध सागर जी महाराज साहेब ने आज के प्रवचन के माध्यम से फरमाया कि अपने मन को शांत करने का श्रेष्ठ माध्यम है ध्यान। ज्ञानी कहते है कि हे चेतन तू ज्ञानी तो है। अब थोड़ा आत्मा का ध्यान कर। भवों भवों में तुमने दुख ही पाया है, अब ऐसी कथा फिर से न दोहराना। बड़े पुण्य के उदय से मानव तन मिला है अब इतना पुरुषार्थ जरूर कर की रत्नत्रय अर्थात चारित्र धर्म प्राप्त कर सकें। अपनी आत्मा के अंदर देख कर सोचना कि मेरे ही अंदर सिद्ध प्रभु स्वयं विराजमान है अब मुझे इनका ही हर क्षण ध्यान धरना है ताकि इस संसार से मुक्ति मिल सके। तेरी प्रभुता इतनी अदभुत है कि दूसरो के बिना कुछ भी नही चलता। जबकि तेरा सबकुछ तेरे ही अंदर है। अब अपनी प्रभुता का उपयोग अपने आत्म लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए करना है। हे मानव तेरे अंदर गुणों का भंडार है। अगर पुरुषार्थ पूर्वक प्रयास करे तो सिद्धों के जैसे तेरी भी कहानी हो सकती है। मुक्ति पूरी ही तेरा असली घर है लेकिन फिर भी न जाने क्यों बाहर संसार में भटक रहा। आज हम एक ऐसे मोड़ पर खड़े है जहां से अगर सच में मुड़ जाए तो जीवन की दशा और दिशा बदल सकती है। जिन्हे सत्य का ज्ञान है वो कभी भी असत्य को सत्य नही मानते। हमे विचार करना है की क्या हम भी सत्य को असत्य तो नही मान रहे है। सत्य मतलब शाश्वत, सच्चाई, निरंजन, वास्तविक।

ज्ञानी कहते है जो सत्य है उसे हमे स्वीकार करना चाहिए। हमे सत्य को जानना भी है और मानना भी है। सत्य को समय निकलने से पहले ही समझना है। सही समय पर सत्य को न समझने वाला नासमझ कहलाता है। इस जीवन का अटल सत्य है मृत्यु। मृत्यु न समय देखती न मुहूर्त। जब जिसका समय पूर्ण हो जाता है उसे तत्काल ही जाना ही पड़ता है। इस जीवन में हमे इतना पुरुषार्थ करना है की हम इस दुनिया से हंसते हंसते जाए। जो इस संसार से रोते रोते जाता है उन्हे आने वाले भव में भी रोते रोते जीवन व्यतीत करना पड़ता है। जबकि हंसते हंसते जाने वाले का मृत्यु भी महोत्सव बन जाता है। आने वाले भव में भी उसका जीवन सुखी बनता है। जीवन का केवल एक ही सार है मृत्यु। ज्ञानी कहते है मृत्यु को अच्छे से जानने वाला जीवन को अच्छे से जीना जान जाता है। समझदारी पूर्वक जीवन जीने वाला वास्तव में मृत्यु को समझ चुका होता है। जैसे एक खिला हुआ फूल मुरझाएगा यह सत्य है उसी प्रकार हमे ये संसार चाहे कितना भी प्यारा क्यों न हो। पर सच यही है कि इस संसार से एक दिन सभी को जाना है। हमारे मन में असत्य का इतना मैल भरा हुआ है कि हम सत्य की स्वीकार ही नही कर पा रहे है। जैसे दूध से मक्खन को अलग करने के बाद उसे फिर से दूध में नही मिलाया जा सकता उसी प्रकार शरीर से आत्मा अलग होने के बाद उसे फिर से उसी शरीर में नही डाला जा सकता। हम खुली आंखों से भी सत्य को नही देख पा रहे है। जबकि ज्ञानी भगवंत हमे आंखें बंद करके संसार को छोड़कर वास्तविक सत्य को जानने, समझने और जीवन में स्वीकार करने के लिए कहते है। ज्ञानी भगवंत कहते है जब तुम नरक और तिर्यंच गति में थे कितने दुखो को सहते थे कष्ट से त्राहि त्राहि करते थे। अब मानव भव मिला है किंतु इस सुअवसर को भी संसार के राग में को खो रहा है। इस नाशवान संसार से हम कुछ भी साथ लेकर नहीं जा सकते। हमारे साथ केवल हमारे कर्म ही जायेंगे। इसलिए हमेशा अच्छे कर्म करना चाहिए। घूमता हुआ घड़ी का कांटा। हमे बार बार समझा रहा है मेरे घूमने के साथ साथ तुम्हारे काल का समय भी पास आ रहा है। अब अगर इस संसार में मेरी तरह घूमना नही चाहता है तो आत्मा के विकास के लिए पुरुषार्थ कर। तभी इस संसार से तेरा भटकना बंद हो सकता है। 

आत्मा के विकास के लिए साधना के राह की आवश्यकता होती है। साधना से मुक्ति की मंजिल मिल सकती है। साधना के लिए पहले  सत्य को जानना और समझना पड़ता है। ज्ञानी कहते है इस जीवन को यह मानकर जियो की कल आने वाला ही नही है। अर्थात अपने जीवन में हर दिन को अंतिम मानकर आत्मविकास का कार्य करते हुए जीवन जीना चाहिए। प्रतिदिन सूर्योदय और सूर्यास्त होता है। डूबता हुआ सूरज हमसे कहता है काल का पहिया जिस तेजी से चलता है मुझे भी समय के साथ अस्ताचल में जाना ही पड़ता है। इसलिए हर कार्य सूर्य की रोशनी में अर्थात सही समय में कर लेना चाहिए। इस संसार में कम से कम इतना प्रयास जरूर करना चाहिए कि हमारे कारण किसी का दिल न दिखे। ज्ञानी कहते है इस संसार में हम कितनी भी शक्ति और संपत्ति प्राप्त कर ले लेकिन जब इस संसार से जायेंगे तो खाली हाथ ही जाना पड़ेगा। इसलिए ऐसा कुछ करो जो साथ में परलोक तक जाए। अर्थात हमारे कर्म ही है जो हमारे साथ जाता है।   अच्छे कर्म करने वाले और अच्छे से जीवन जीने वाले की मृत्यु कभी खराब नही होती। मृत्यु जीवन का द्वार है। मृत्यु आने से पहले जीवन को अच्छे कर्म रूपी राह पर ले जाना है। ताकि आने वाले भव में अच्छा जीवन रूपी मंजिल प्राप्त हो सके। विज्ञान कितना भी विकास कर ले लेकिन मृत्यु से आगे नहीं निकल सकता। जबकि ज्ञानी कहते है अपनी इच्छाओं को मारने वाला मृत्यु से आगे निकल सकता है। क्योंकि ऐसे व्यक्ति को मृत्यु का भय नहीं रहता है। इस पल के लिए वह हमेशा तैयार रहता है।

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