हैदराबाद - हैदराबाद, त्रयनगर स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी के प्रांगण में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास–2026 के अंतर्गत 26 अगस्त 2026 को चातुर्मासार्थ विराजमान परम पूज्य गुरुदेव सूरिसम्राट, खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में कर्म सिद्धांत और जीवन में घटने वाली अप्रत्याशित परिस्थितियों को समझाते हुए कहा कि जीवन में अनेक ऐसी घटनाएँ घटती हैं, जिनका उत्तर हमें तत्काल नहीं मिलता। तब मन में प्रश्न उठता है—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?” कभी मनपसंद भोजन सामने होते हुए भी हाथ नहीं आता, कभी व्यापार का सौदा अंतिम क्षण में रुक जाता है और कभी नियमों का पालन करने वाले व्यक्ति को भी प्रतिकूल परिणाम का सामना करना पड़ता है। ऐसे प्रश्नों का समाधान केवल बाहरी परिस्थितियों में नहीं, बल्कि कर्म सिद्धांत की समझ में निहित है। विज्ञान अनेक प्रश्नों के उत्तर दे सकता है, लेकिन जहाँ उसके उत्तर समाप्त होते हैं, वहाँ अध्यात्म कर्म के रहस्य को समझने का मार्ग दिखाता है।
जैन दर्शन के अनुसार कर्म का बंधन करने वाले भी हम हैं और उसका फल भोगने वाले भी हम ही हैं। हम अपने भविष्य के लिए स्वयं कर्मों की चिट्ठी लिखते हैं और समय आने पर वही चिट्ठी हमारे हाथों में पहुँचती है। डाकिया केवल निमित्त है, चिट्ठी लिखने वाले तो हम स्वयं हैं। इसलिए जीवन में आने वाले प्रत्येक परिणाम के लिए दूसरों को दोष देने के बजाय अपने कर्मों को समझना आवश्यक है।
परमात्मा आदिनाथ के जीवन से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि एक किसान को बैलों के मुख पर छीका बाँधने का सुझाव आदिनाथ भगवान ने दिया था। सुझाव देने वाले भगवान थे और उसे बाँधने वाला किसान था, फिर भी उस निमित्त से संबंधित कर्म का बंधन आदिनाथ के जीव को हुआ और दीक्षा के पश्चात उन्हें लंबे समय तक आहार प्राप्त नहीं हुआ। इस प्रसंग से हमें यह सीख मिलती है कि किसी को भी ऐसा सुझाव अथवा प्रेरणा नहीं देनी चाहिए, जो उसके या हमारे लिए पापकर्म के बंध का निमित्त बने।
कर्म सिद्धांत केवल सुनने या समझने की बात नहीं, बल्कि उसे जीवन में उतारने की बात है। यदि हमें वास्तव में विश्वास हो जाए कि जैसा करेंगे, वैसा ही फल प्राप्त होगा, तो हमारी भाषा, व्यवहार और विचार स्वतः बदलने लगेंगे। झूठ बोलने, कटु शब्द कहने, हिंसा करने, अहंकार अथवा कषाय करने से पहले मनुष्य स्वयं को रोकने लगेगा।
उन्होंने समझाया कि अतीत को बदला नहीं जा सकता। जो कर्म पहले बाँधे जा चुके हैं, उनका फल भोगना ही पड़ेगा; लेकिन वर्तमान हमारे हाथ में है। आज हम नए कर्मों के बंध को रोक सकते हैं और अपने भावों को शुद्ध कर सकते हैं। यदि भविष्य में शांति, सुख और समाधि चाहिए, तो वर्तमान को सजाना होगा।
आचार्य श्री ने कहा कि कर्म सिद्धांत का सरल संदेश है—“जो बोओगे, वही काटोगे।” इसलिए जीवन में जब कभी प्रश्न उठे—“मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?”—तो दूसरों की ओर देखने के बजाय अपने कर्मों की ओर देखिए। उत्तर भी वहीं मिलेगा और समाधान का मार्ग भी वहीं से प्राप्त होगा।
अंत में गुरुदेव श्री ने मासक्षमण तप की आराधना कर रहे मुनि श्री मुकुंदप्रभसागरजी म.सा., साध्वी श्री प्रियपुण्यांजनाश्रीजी म.सा., साध्वी श्री प्रियपूर्वांजनाश्रीजी म.सा. एवं साध्वी श्री प्रियदीक्षांजनाश्रीजी म.सा. की तपस्या की अनुमोदना करते हुए उन्हें बधाई एवं शुभकामनाएँ प्रेषित कीं। इस अवसर पर उपस्थित समस्त श्रावक-श्राविकाओं ने भी तपस्वियों को अक्षतों से बधाकर अपनी श्रद्धा एवं अनुमोदना व्यक्त की।