रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में रविवार को विशेष प्रवचन माला में मुनिश्री संवेगरत्न सागर म.सा. ने कहा कि हम सभी जिन शासन की कल्याणकारी परंपरा से जुड़े हैं। इस परंपरा में प्रत्येक जीव के प्रति दया और कल्याण का भाव है। यह हमारे तीर्थंकर परमात्माओं का उपकार है। जीवन में उपकार का भाव रहेगा तो निरंतर गति और प्रगति होगी।
मुनिश्री ने कहा कि उपकार के तीन प्रमुख प्रकार हैं। पहला जन कल्याण की भावना, दूसरा स्व कल्याण की साधना और तीसरा मानव कल्याण के लिए देशना। हर मानव के प्रति कल्याण की भावना रखना जन कल्याण है। स्वयं के आत्मकल्याण के लिए पुरुषार्थ करना स्व कल्याण है। इसी पुरुषार्थ के माध्यम से परमात्मा ने कैवल्य की प्राप्ति की। मानव कल्याण के लिए धर्म और सद्मार्ग की देशना देना भी बड़ा उपकार है। सबसे बड़ा दान उपदेश का दान है। यही जिन शासन का हम पर सबसे बड़ा उपकार है।
अनेक कष्टों के बाद मिला है मानव भव
मुनिश्री ने कहा कि मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ है। इसे प्राप्त करने के लिए जीव ने न जाने कितने भवों में कितने दुखों का वेदन सहा होगा। परमात्मा ने बताया है कि इस मानव भव की प्राप्ति सहज नहीं है। जो केवल गुजारे के लिए जीवन जीता है, वह गुजर जाता है; लेकिन जो जीवन को सही अर्थों में जीता है, वह संवर जाता है।
मुनिश्री ने कहा कि हमें इतना उत्तम जीवन मिला है, लेकिन यदि इसमें ज्ञान की ज्योति नहीं जलाई तो अज्ञान के अंधेरे में भटकते रहेंगे और पता भी नहीं चलेगा कि कहां पहुंच गए। अनेक भवों की वेदना सहने के बाद भी यदि जीव जागृत नहीं हुआ तो यह दुर्लभ मानव जीवन आने वाले समय में और दुष्कर हो जाएगा। शास्त्रकार भगवंतों ने कहा है कि भगवान बनना भी संभव है, लेकिन मानव बने बिना भगवान नहीं बना जा सकता।
मानव के तीन स्तर, सबसे ऊपर सच्चा मानव।
मुनिश्री ने कहा कि मानव मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं। पहला अच्छा मानव, दूसरा खरा मानव और तीसरा सुपर मानव। इन सबसे ऊपर सच्चा मानव होता है, जो अनासक्त भाव से जीवन जीता है। हमें मानव का चोला तो मिल गया है, लेकिन भीतर क्या बैठा है, इस पर विचार करना जरूरी है। कहीं हमारे भीतर पशु प्रवृत्तियां तो नहीं हैं।
मुनिश्री ने कहा कि सच्चा मानव बनने के लिए अनासक्त भाव से जुड़ना होगा। अच्छा मानव बनने के लिए सत्संग सबसे बड़ा सहारा है। सत्संग पतित व्यक्ति को भी संत बनाने की क्षमता रखता है। यदि आत्मा सत्संग से जुड़ी रहेगी तो धीरे-धीरे वह पवित्र होती जाएगी। इसलिए दुर्लभ मानव जीवन को केवल भौतिक सुखों में न गंवाकर आत्मकल्याण और परोपकार के मार्ग पर लगाना चाहिए।