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“हमेशा दूसरों की अच्छाई देखो” — आचार्य भगवंत श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा.

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हैदराबाद/रायपुर - हैदराबाद त्रयनगर स्थित कारवान दादावाड़ी में आयोजित श्री संघ शास्ता वर्षावास के अंतर्गत 12 अगस्त 2026 को परम पूज्य गुरुदेव खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने अपने चातुर्मासिक मंगल प्रवचन में भगवान महावीर की देशना को जीवन निर्माण का मार्ग बताते हुए दृष्टिकोण में सकारात्मकता और आत्महित को प्राथमिकता देने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि वीतराग परमात्मा महावीर की देशना का प्रत्येक सूत्र जीवन के परम आदर्श को प्रस्तुत करता है। केवलज्ञान के आलोक में परमात्मा ने जीवन, वातावरण, संसार के समस्त पदार्थों, द्रव्यों और उनकी पर्यायों को देखा तथा सत्य का साक्षात्कार कर जो देशना दी, उसका प्रत्येक शब्द हमारे जीवन को सही दिशा देने वाला है।

गुरुदेव श्री ने कहा कि हमें जीवन को सफल भी करना है और सार्थक भी। जीवन को तीन अवस्थाओं में देखते हुए उन्होंने कहा कि बचपन पढ़ाई के लिए, युवा अवस्था कमाई के लिए और वृद्धावस्था पुण्याई के लिए महत्वपूर्ण है। जीवन में विभिन्न स्थितियाँ और परिस्थितियाँ आती रहती हैं, लेकिन उनका सामना किस दृष्टि से किया जाए, यह हमारे हाथ में है। इसका पहला सूत्र है—किसी की बुराई नहीं देखनी, हमेशा दूसरों की अच्छाई देखनी है।

दूरबीन का उदाहरण देते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि दूर की वस्तु को नजदीक दिखाने वाले छोटे काँच से देखने पर छोटी चीज भी बड़ी दिखाई देती है। इसी प्रकार जब किसी में छोटी-सी अच्छाई दिखाई दे तो उसे बड़ा करके देखना चाहिए। वहीं किसी की बुराई या दुर्गुण दिखाई दे तो दृष्टि बदल देनी चाहिए, ताकि बड़ी बुराई भी छोटी दिखाई दे। उन्होंने कहा कि जब किसी की बुराई दिखाई दे तो तुरंत दर्पण की ओर देखना चाहिए। दूसरे में दिखाई देने वाला दुर्गुण अपने भीतर कितना है, इसका आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। वहीं किसी में अच्छाई दिखाई दे तो कैमरे की तरह उस अच्छाई को ग्रहण कर अपने भीतर उतारने का प्रयास करना चाहिए।

हमें यह भी विचार करना चाहिए कि हम केवल सुख के पीछे भाग रहे हैं या अपने हित के लिए प्रयास कर रहे हैं। सुख और हित में बहुत अंतर है। हर सुख हमारे लिए हितकारी हो, यह आवश्यक नहीं। ऐसा सुख किस काम का, जिसका परिणाम अहितकारी हो? इसके विपरीत ऐसा दुःख भी सार्थक है, जिसका परिणाम हमारे हित में हो। भगवान महावीर की देशना संसार के क्षणिक सुख के लिए नहीं, बल्कि आत्मा के हित के लिए है।

उन्होंने कहा कि जीवन में निर्णय लेते समय केवल यह नहीं देखना चाहिए कि “मुझे अच्छा क्या लग रहा है?”, बल्कि यह देखना चाहिए कि “मेरे लिए हितकारी क्या है?” इंद्रियों को जो अच्छा लगे, वह हमेशा हमारे हित में हो, यह जरूरी नहीं। जीवन जीने की सच्ची कला यही है कि हम क्षणिक सुख से अधिक आत्महित को महत्व दें।

यदि जीवन जीने की कला सीखनी है तो सबसे पहले अपनी निगाहों को बदलना होगा। जीवन को केवल सफल बनाना पर्याप्त नहीं है, उसे सार्थक बनाना भी आवश्यक है। दूसरों की अच्छाई देखने, अपने भीतर आत्मनिरीक्षण करने और आत्महित को प्राथमिकता देने वाली दृष्टि ही जीवन को सही दिशा प्रदान करती है।

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