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सदाचार ही प्रथम धर्म, इसे अपनाकर मिलेगी दुख-दुर्गति से मुक्ति : मुनिश्री संवेगरत्न सागर म.सा.

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विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास।

रायपुर - विवेकानंद नगर स्थित ज्ञानवल्लभ उपाश्रय में जारी सर्वमंगलमय वर्षावास में धर्म और आत्मचिंतन की ज्ञानधारा प्रवाहित हो रही है। परम पूज्य मुनिश्री संवेगरत्न सागर जी म.सा. के मुखारबिंद से श्रावक-श्राविकाएं प्रतिदिन जिनवाणी का श्रवण कर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं।

धर्मसभा में मुनिश्री ने कहा कि जीवन में दुख आना स्वाभाविक है, लेकिन दुख के प्रति हमारी प्रतिक्रिया ही उसके प्रभाव को तय करती है। यदि दुख का प्रतिकार करते रहेंगे तो वह हावी होता रहेगा, लेकिन दुख को सहजता से स्वीकार कर लिया जाए तो उसका प्रभाव कम हो जाता है। अनाचार का सेवन करेंगे तो भव-भ्रमण चलता रहेगा और सदाचार को जीवन में उतारेंगे तो भव-भ्रमण समाप्त करने का मार्ग प्रशस्त होगा।

मुनिश्री ने कहा कि सदाचार ही प्रथम धर्म है। केवल अच्छे विचार सुनना या ग्रहण करना पर्याप्त नहीं है, जब तक उन्हें जीवन के आचरण में नहीं उतारा जाएगा, तब तक वे केवल विचार बनकर रह जाएंगे। जिनवाणी सुनने के बाद यदि आचार को प्राथमिकता नहीं दी तो उसके वास्तविक मर्म को आत्मसात नहीं किया जा सकता।

मुनिश्री ने कहा कि जो जीव अनाचार और दुर्ध्यान में अपने जीवन को व्यर्थ करता है, उसकी रुचि भी धीरे-धीरे उन्हीं प्रवृत्तियों में बढ़ने लगती है। इसके परिणामस्वरूप दुख, दुर्गति और पीड़ा का चक्र लगातार चलता रहता है। बार-बार अनाचार का सेवन करने से जीव स्वयं को उसी चक्र में बांधता चला जाता है। यदि अनाचार का त्याग कर दिया जाए तो दुख, दुर्गति और पीड़ा से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।

मुनिश्री ने  कहा कि मिथ्या दृष्टि वाले जीव के जीवन में आचार कम होता है, जबकि सम्यक दृष्टि वाले जीव के जीवन में आचार निरंतर बढ़ता जाता है। इसलिए केवल अनाचारों का ज्ञान बढ़ाना समाधान नहीं है। जीवन में सदाचार को बढ़ाना आवश्यक है।

मुनिश्री ने कहा कि ज्ञान ध्यान में रहना जरूरी है। ज्ञान ध्यान ही जीवन में आचार और अनाचार के बीच विवेक का बोध कराते हैं। आचार व्यक्ति को जीवन में ऊंचाई की ओर ले जाता है, जबकि अनाचार उसे पतन की ओर धकेलता है।

मुनिश्री ने कहा कि अनाचार का व्यसन इतना गहरा हो जाता है कि जीव उसमें जाने के लिए भी खूब पुरुषार्थ करता है,लेकिन जितना अधिक समय अनाचार और दुर्ध्यान में बीतेगा, उतना ही जीव मोक्ष मार्ग से विमुख होता जाएगा। इसलिए जिनवाणी को केवल सुनने तक सीमित न रखते हुए उसे जीवन के आचरण में उतारना उद्देश्य हो।

चातुर्मास में बड़ी संख्या में तप जारी।

चातुर्मास समिति के अध्यक्ष जसराज लुनिया और महासचिव सुरेश बरड़िया ने बताया कि धर्मसभा में बाल मुनि श्रुतरत्न सागर जी म.सा. का अवतरण दिवस भक्ति भाव से मनाया गया। श्रावक-श्राविकाओं ने चंदन और अक्षत से गुरु भगवंत को बधाया। सर्वमंगलमय वर्षावास में श्री पंचपरमेष्ठी श्रेणी तप गतिमान है। श्री  गिरनार तप का प्रारंभ है। तप की श्रृंखला में आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर दोनों तप तपस्वियों ने गुरु भगवंत से मांगलिक प्राप्त कर सामूहिक व्यासना किया। 1 घंटे के भीतर सभी ने एक स्थान में बैठकर अन्न-जल ग्रहण किया। बुधवार को दोनों तप के तपस्वियों का उपवास होगा। धर्मसभा में 8 उपवास की तपस्वी श्वेता लोढ़ा का सम्मान कर तपस्या की अनुमोदना की गई।

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