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दसलक्षण महापर्व का आठवां दिन "उत्तम त्याग" धर्म के रूप में मनाया गया।

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धर्म और आत्मा को जीवित रखने के लिए त्याग आवश्यक - माता जी।

बिलासपुर - श्री दिगम्बर जैन समाज द्वारा दसलक्षण महापर्व का आठवाँ दिन "उत्तम त्याग" धर्म के रूप में मनाया गया। समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर महाराज की शिष्या आर्यिका श्री 105 अकम्प मति माता जी, आर्यिका श्री 105 अचल मति माता जी के सानिध्य में 1008 श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, क्रातिनगर में विभिन धार्मिक कार्यक्रम हो रहें है । प्रवचन मे माताजी ने बताया कि धन से सुख नहीं त्याग से है, सुख पांच इंद्रियां से और आंनद त्याग से मिलता है को प्रवचन मे समझाया। 

पर्व के दौरान बाहर से आए सभी श्रावक श्राविकाओ के भोजन की व्यवस्था समाज के संरक्षक श्रीमंत सेठ प्रवीण शकुन जैन, श्रीमंत सेठ विनोद रंजना जैन, सुकुमार सरिता जैन परिवार की तरफ से क्रांतिनगर जैन भवन मे की गई है। जिसका लाभ प्रतिदिन लोग ले रहे है।


सभी कार्यक्रमों में प्रवीण जैन, विनोद जैन, शकुन जैन, रंजना जैन, सुकुमार जैन, सनत जैन, दीपक जैन, जय कुमार जैन, कैलाश जैन, भूपेंद्र चंदेरिय, विशाल जैन, प्रकाश रंजनी वासल, राकेश जैन, सुनीता जैन, आशा जैन, मंगला जैन, प्रमोद जैन, रेखा जैन, अरुण जैन, आशा जैन, दिनेश जैन, उषा जैन, सत्येन्द्र जैन, निधि जैन, पदम जैन, ममता जैन, सुनील जैन, नमिता जैन, शैलेष जैन, शालिनी जैन सहित समाज के लोग उपस्थित थे।

प्रवचन - 

समाधिस्थ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज एवं आचार्य श्री समय सागर महाराज की शिष्या आर्यिका श्री 105 अकम्प मति माता जी, आर्यिका श्री 105 अचल मति माता जी के सानिध्य में 1008 श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन मंदिर, क्रातिनगर में विभिन धार्मिक कार्यक्रम हो रहें है । प्रवचन मे माताजी ने बताया कि धन से सुख नहीं त्याग से है, सुख पांच इंद्रियां से और आंनद त्याग से मिलता है। धन दूसरों के लिए त्याग स्वम के लिए, दान देने वाला उपर और लेने वाला नीचे होता है। पंचम काल के अंत तक साधु रहेंगे और तभी तक धर्म रहेगा दान रहेगा। दान 4 प्रकार का आहार, अभय, उपकरण, औषध दान । एक हाथ से दान करो दूसरे हाथ को पता ना चले। दान चक्रवर्ती कहलाता है। करम के क्षय के लिए दान देना चाहिए। त्याग के बिना कोई धर्म जीवित नहीं रह सकता। जिसने भी अपने जीवन में त्याग किया है वही चमकता है। धर्म और आत्मा को जीवित रखने के लिए त्याग आवश्यक है। समस्त भोग विलास की वस्तु का त्याग करना ही मुक्ति का मार्ग है अपने जीवन में खराब कार्यों और पापों का त्याग करना चाहिए तभी मनुष्य जीवन की सार्थकता है। 

तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन

पर्व के आठवें दिन "उत्तम त्याग " पर तत्त्वार्थ सूत्र का वाचन ज्योति जैन, रीना जैन, श्वेता जैन, रजनी जैन, निधि जैन, रागिनी जैन, शालिनी जैन, मनोरमा जैन, रंजीता जैन, सुमन लता जैन, एकता जैन, समता जैन ने किया। वाचन से पूर्व सभी ने अभिषेक शांति धारा किया।

बुधवार को "16 स्वर्ग" की भव्य प्रस्तुति हुई।

उत्तम त्याग धर्म के दिन धार्मिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में "16 स्वर्ग" का मंचन किया गया। सभी इंद्र अपनी अपनी इंद्राणियों के साथ पूजा करने के लिए नंदीश्वर दीप जा रहे हैं। कुल्चा कल 14 इंद्र होते हैं 16 स्वर्ग में जैन धर्म के अनुसार और सभी के अपने-अपने वहां सभी के अपने-अपने मुकुट के चिन्ह अलग-अलग होते हैं सभी की ऊंचाई सभी के धन वैभव संपत्ति अलग-अलग होती है यह सभी दर्शाने के लिए यह इंद्र यहां पर आए हैं। डॉ. सुप्रीत जैन एवं डॉ श्रुति जैन के निर्देशन में "16 स्वर्ग" का बुधवार को भव्य प्रस्तुति की गई । इन्द्र बनने वालों में श्रीमंत सेठ प्रवीण-शकुन जैन, श्रीमंत सेठ विनोद रंजना जैन, सुकुमार-सरिता, डॉ. पी. सी. वासल-रंजनी वासल, राकेश-सुनीता जैन ,  सनत-आशा जैन, कैलाश मंगला जैन, प्रमोद-रेखा जैन, अरुण-आशा जैन, दिनेश ऊषा जैन, सत्येंद्र निधि जैन, पदम्-ममता जैन, सुनील नमिता जैन, शैलेश शालिनी जैन थे।

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