आपका जीवन अनमोल है, विचारों को भी वैसा ही बनाएं: साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी
रायपुर। परमात्मा के प्रति, गुरुतत्व के प्रति और अपने पूज्यजनों के प्रति जब विनय गुण विकसित होने लग जाता है तो किसी को बताना नहीं पड़ता कि आपको कैसे करना है। परमात्मा की आज्ञा स्वत: ही पालन होने लग जाती है। यह गुण विकसित हो गया। इसके बाद कुछ भी नहीं आया तो भी ज्ञानी कहते कि आत्मा उस मोक्ष तत्व को प्राप्त कर लेगी। यह बातें शुक्रवार को न्यू राजेंद्र नगर के मेघ-सीता भवन, महावीर स्वामी जिनालय परिसर में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी ने कही।
साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी ने आगे कहा कि आप हीरे, सोने-चांदी के जेवर खास मौकों पर ही पहनते हो। यह अनमोल है, हर जगह, हर समय इसे आप नहीं पहनते हो। वैसे ही हमारा जीवन अनमोल है, वैसे ही हमें हमारे विचारों को भी अनमोल रखें। जैसे कि हीरों के जेवर को आप डब्बे में रखते है, उसके ऊपर एक और डिब्बा होता है, फिर उसे थैले में रखते है और फिर एक बड़े बैग में रखते हैं। एक बेटी जब अपने मायके जाती है, तो हीरों का हार, सोने के जेवर और अंगुठी पहनकर जाती है। वह चाहती है कि मुझे सबसे ज्यादा सम्मान मिले। वहीं, जब रिटर्न के दौरान सभी को लिफाफा मिलता है, तो उसे लगता है कि मेरे को सबके जितना ही दिया गया है। मैंने हीरों का हार पहना हुआ है, पर मुझे सबके बराबर आंका जा रहा है। ऐसे में हीरों का सबसे महंगा हार पहनने का क्या मतलब हुआ।
काया से सत्कार नहीं किया तो यह मिट्टी से बद्तर है।
साध्वी स्नेहयशाश्रीजी ने कहा कि हमारा संसार का जो सुख है वह पराई वस्तु को धारण करके खुशी मनाने के जैसा है। संसार का सुख याचना कर, मांग कर किसी आभूषण को पहनकर किसी कार्यक्रम को उत्साह से मनाते हो और लोग देखकर आपकी तारीफ कर रहे है, तो यह सुख आपके लिए क्षणिक है। क्या आप ऐसी ही सुख चाहते हो। हमारा जीवन अनमोल है, पर क्या हमारे विचार भी अनमोल है। ऐसे देखोगे तो इस काया की कोई कीमत नहीं है। यह काया कंचनवान है और अगर इससे को सत्कार नहीं किया, तो यह मिट्टी से भी बद्तर है। पशुओं का सब काम आता है, उनकी चमड़ी से लेकर उनके अंदर मौजूद सभी अंग काम आते है। हमारा तो कुछ काम नहीं आता और मृत्यु के बाद बची राख भी कोई काम की नहीं हाेती है। फिर भी हम अनमोल, हमारे जैसे क्वालिटी का जीवन कोई नहीं जी सकता है। हीरे की चुड़ी का मोल आप कर रहे हो, पहन कर आए हो तो उसे सहज-सहज कर रखते हो, पूरे समय आप उसे संभाल कर रखते हो। ऐसा इसीलिए क्योंकि वह कीमती चीज है।
मोहिनीय कर्म का चक्कर छोड़ों।
साध्वीजी बताती है कि इस दुनिया में ऐसे भी लोग है, जिन्हें धर्म और किसी चीज से मतलब नहीं है। वे अपने काम से काम का मतलब रखते है। सुबह दुकान जाते है, वहां काम करते है और रात को वापस घर आ जाते है। पर यह सभा, परमात्मा की सभा है। अाप कभी शहर से बाहर जाते हो तो होटल में रूकते हो। वहां आपकी सेवा में हमेशा एक वेटर सेवा में लगा रहता है। यह केवल इसीलिए होता है कि आपने उसे पैसा दिया है। अगर अाप उस होटल में एक हफ्ता भी रहते हो, तो उससे आपको कोई लगाव नहीं होता। पर आपको अपने उस घर से लगाव होता है, जो आपका है ही नहीं। आप कितना भी अच्छा आलीशान घर बनवा लो, पर वह हमेशा के लिए आपका नहीं हो सकता। ऐसे ही यह संसार है, हम यहां कुछ दिनों के लिए आए है। यह मोहिनीय कर्म का चक्कर है। एेसा चक्कर कि जैसा कोई व्यक्ति शराब के नशे में हो। हम भी ऐसे ही किसी माेहिनीय कर्म के चक्कर में फंस गए है, जहां हमें सब चीज हमारी लगती है।
किसी को उपदेश देने से पहले उसे अपने अंदर उतारे।
गुरुवर्याश्री बताती है कि एक बार की बात है दो भाईयों में 4 इंच की दीवार को लेकर झगड़ा चल रहा होता है। घर में मुखिया और एक वकील की घर की बंटवारे के विवाद को लेकर चर्चा होती है। वहीं, बाहर मुखिया के दोनों बच्चें खाना खा रहे होते है। बड़ा बेटा, छोटे के थाली से एक आम का टुकड़ा उठाकर खा लिया। इस पर छोटा पुत्र भड़क गया और कहने लगा कि तुमने मेरे थाली से उठाकर क्यों खाया, तुम्हें और मुझे दोनों को बराबर मात्रा में आम काटकर दिया गया था। इतने में इस शोर को सुनकर उनके पिता बाहर आकर कहते है कि तुम दोनों को पता है न कि कोई घर में आता है तो शांत रहना चाहिए। अंदर वकील साहब के साथ मेरी मीटिंग चल रहीं हैं। छोटा पुत्र पूरी बात बताता है। इस पर पिता कहते है कि तुमने राम-लक्ष्मण और भरत की कहानी नहीं सुनी है। भाईयों का प्रेम नहीं जानते, कल तुम्हारे स्कूल जाकर टीचर को कहुंगा कि वे तुम्हें भगवान राम-लक्ष्मण का पाठ पढ़ाएं। इस पर पुत्र पूछता है कि क्या आप भी हमारे साथ स्कूल चलोगे। पिता पूछते है क्यों मैं क्यों तुम्हारे साथ स्कूल जाऊंगा। पुत्र कहता है कि आपको भी राम-लक्ष्मण और भरत की कहानी सुनने की जरूरत है।