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सबसे बड़ा दोष यह कि हम दूसरों में दोष देखते है और खुद में गुण: साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी।

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रायपुर। संसार का सबसे बड़ा दोष यह है कि हम दूसरों में दोष देखते है और खुद में गुण खोजते है। हम हमेशा यह देखते है कि कौन कितना पानी में हैं। हमने कभी इसकी तुलना नहीं की है कि हम कितने पानी में है। जबकि हमें खुद में दोष देखकर दूसरों में गुण खोजना चाहिए। यह बातें रविवार को न्यू राजेंद्र नगर के मेघ-सीता भवन, महावीर स्वामी जिनालय परिसर में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन के दौरान साध्वी श्री स्नेहयशाश्रीजी ने कही। साध्वीजी ने आगे कहा कि एक बार की बात है, एक आदमी अपने गुरु से मिलने जाता है। वापसी के दौरान गुरु उसे एक कांच का टुकड़ा देते है और कहते है कि ऐसा-वैसा कांच नहीं है। इससे देखने में आदमी के अंदर के दोष दिखाई देते है। वह आदमी सबसे पहले अपने दोस्त के पास गया और उसे कांच में देखा। वह हैरान रह गया, उसे कांच के अंदर अपने दोस्त के अंदर दोष, कोध, ईर्ष्या, द्वेष, लालच, मायाचारी आदि जैसे कई दुर्गुण नजर आते है। फिर उसने अपने पड़ोसी को उस कांच से देखा, वह भी ऊपर से नीचे तक दुर्गुणों से भरा हुआ था। वह अपने नगर के सभी लोगों को उस कांच से देखता है, यह देखने के बाद उसे बड़ी हैरानी होती है कि उसके नगर का एक भी व्यक्ति गुणी नहीं है। सबके अंदर कोई न काेई दोष जरूर है, थोड़ा ही सही पर सबमें है। वह चिंतित होकर अपने गुरु के पास पहुंचता है। गुरु ध्यान कर रहे होते है, इसी दौरान वह उन्हें भी उस कांच से देखता है। अब वह आश्चर्यचकित रह जाता है। उसके गुरु के अंदर भी तरह-तरह के दाेष उसे दिखाई देते है। आंखें खुलने पर वह गुरु को बताता है कि मैंने अपने दोस्त, अपने पड़ोसी और पूरे नगर के व्यक्तियों को इस कांच से देखा, यहां तक कि आप के अंदर भी मुझे कोई गुण नहीं दिखा गुरुजी। इस पर गुरु कहते है कि यह कांच का टुकड़ा तुम्हें मैंने दुनिया को देखने नहीं, खुद को देखने के लिए दिया था।

न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।
साध्वीजी कहती है कि अगर आपके पैर में कोई कांटा चुभ जाए तो पहले उस कांटे को निकालो। जब हमें काेई कांटा चुभ जाता है तो हम सोचते है कि क्यों न इस कांटे के पेड़ को ही कटवा दिया जाए। क्योंकि न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी। हम इसी सोच के साथ चलते है, पर क्या आपने यह सोचा है कि अगर आप वह पेड़ काटने जाएंगें तो पहला ही कदम बढ़ाने पर आपको पैर में चुभा हुआ कांटा कितना दर्द देगा। पहले आपको अपने पैर में चुभा हुआ कांटा निकालना है। अापको उस चप्पल का आविष्कार करना है कि वह कांटा दोबारा आपको चुभे नहीं। पुरानी समय की एक बात है, एक राजा अपने नगर के भ्रमण में निकलता है। रास्ते में उसके पैर में एक कांटा चुभ जाता है। इस पर राजा आदेश देता है कि पूरी दुनिया के सड़कों पर चमड़े की परत चढ़ा दी जाए। राजा के सलाहकार कहते है कि पूरी दुनिया की सड़कों को चमड़े से ढंकना तो संभव नहीं है महाराज। राजा कहते है- तो क्या करें, दुनिया के सभी कांटों के पेड़ कटवा दिया जाए। सलाहकार कहते है कि महाराज उससे अच्छा तो यह होगा कि अाप उन चमड़ों से एक जूता बनवा लीजिए, इससे आपके पैरों में कभी कांटें नहीं चुभेंगे।
अपना भविष्य खुद देखो।
साध्वीजी कहती है कि आपको अपना भविष्य देखने के लिए किसी ज्योतिष के पास जाने की जरूरत नहीं है। आप अपना भविष्य खुद ही देख सकते हो। एक ब्राह्मण दीक्षा लेना चाहता था, वह गौतम स्वामी के पास गया और बाेला हे प्रभु मुझे दीक्षा लेना है। गाैतम स्वामी खुद उसे लेने उसके घर गए। तब उस ब्राह्मण ने कहा कि मुझे दीक्षा तो लेनी है पर मैं अपनी पत्नी को नहीं छोड़ सकता, मैं उसके बिना एक पल भी नहीं रह सकता हूं। गौतम स्वामी ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता है। अगर तुम्हें दीक्षा लेना है, मोक्ष की प्राप्ति करनी है तो अपनी का पत्नी का त्याग तो तुम्हें करना ही पड़ेगा। ऐसा कहकर वे उसके घर से निकलते है, तो ब्राह्मण उन्हें बाहर तक छोड़ने भी आता है। स्वामी कहते है कि इतनी दूर तो आ गए हो, बस अब तुम्हें घर की यह दहलीज पार करनी है। उसने कहा कि इतनी ही मेरी तैयारी नहीं है। स्वामी आगे बढ़े और ब्राह्मण पीछे की ओर मुड़ा, चार कदम चलने के बाद एक खंभे से टकराकर उसकी मौत हो गई। अब अगले जन्म वह अपनी पत्नी के साथ ही था। उसका जन्म एक जुंए के रूप में हुआ और वह हमेशा अपनी पत्नी के सिर में ही रहता था। साध्वीजी कहती हैं कि अगर अापको नदी पार करनी है तो नाव से लगाव मत रखो, किनारे तक पहुंचने का लक्ष्य बनाओ।

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