January 16, 2023


जिले की राजनीति में योगेश्वरसिंह राज हासिये पर, मौन धारण करना जनमानस में समझ से परे।

                   रामकुमार टंडन

कवर्धा : जिले की राजनीति में जिस राजनेता का नाम मशहूर था, आज हासिए में पर छोड़ दिया गया है। इस घराने का धमक राजतंत्र से लेकर प्रजातन्त्र में रहा है, कुछ वर्ष से राजनीतिक शून्यता आ गयी है, या फिर कोई दखल देना नही चाहते हैं, ये तो खुद ही बता सकते हैं। फिलहाल तो जिले की राजनीति में सक्रिय नही होने के साथ ही नाम लेवा नही है। कबीरधाम जिले में दो विधानसभा क्षेत्र है पंडरिया और कवर्धा दोनो विधानसभा में कांग्रेस पार्टी का कब्जा है। बात राजघराने से ताल्लुक रखने वाले योगेश्वरसिंह राज की हो रही है। राजतंत्र के राजघराने का वारिसान राजा होने के साथ ही प्रजातंत्र में भी परिवार के साथ ही खुद राजा अर्थात विधायक रहे हैं। आज भी दरबार में लोग मिलने आते जाते रहते हैं। राजनीतिक की परख रखने वालों से चर्चा परिजर्चा भी होती है। महल के अंदर से बाहर की जानकारी लेते रहते हैं। राजनीति में छोटे बड़े पधाधिकारी सक्रिय हो नेताओं के आगे पीछे चलते हैं। वैसा वह मंच पर दिखाई नही देते हैं। सॉफ्ट राजनेता की छवि रही है, इसलिए विचलित नही हुए हैं। विधानसभा 2018 के चुनाव में कुछ तेवर बदला था, बाद में शांत हो घर बैठ गए हैं। तब से बीते चार साल में इतनी शिथिलता आ गयी है, कि कोई नाम लेवा भी जिले की राजनीति में नही रह गया है। योगेश्वरसिंह राज की राजनीतिक बनवास 10 वर्ष हो गया है। इस बार उन्हें स्थान नही मिलता है, तो बगावत पर उतारू होना पड़ेगा, नही तो महल की राजनीति समाप्त होने वाली है। भले ही राजतंत्र खत्म हो गया है, पर हर साल दशहरा में हजारों लोग दर्शन करने जिले की जनता पहुंचती है। इसलिए उनका अपना अलग अमिट पहचान है, जो और से अलग करता है।राजनीति में पार्टी की सिंबल पहचान के लिए बहुत ज्यादा असरकारक होता है, किंतु जिले की राजनीति में योगेश्वर सिंह राज किसी पहचान के मोहताज नही है। कांग्रेस पार्टी की राजनीति उन्हे इस हाशिए पर छोड़ दिया है, कि वापस आना मुश्किल सा लगता है। कुछ जाति के नेता लोग अपनी जाति की संख्या गिनाकर टिकट मांगते हैं, उसको भी पैमाना मान लिया जाए तो योगिराज की जातिवालों की संख्या सबसे ऊपर है। हालांकि कवर्धा पंडरिया दोनों विधानसभा में जाति का तिलिस्मा टूट चुका है। 12वी पीढ़ी का राजकुमार जो 1991 के चुनाव में भाजपा के कद्दावर नेता डाक्टर रमनसिंह को भी हार का मजा चखा चुके हैं, ऐसे राजपरिवार के राजा योगेश्वरराज सिंह को दो बार हो गया है टिकट नही मिल पा रहा है। वैसे भी सिंह 1967 के हिसाब से उम्रदराज भी नही हुए हैं, पूरी सक्षमता के साथ फिट हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में जैसा कांग्रेस पार्टी के लिए माहौल बना था वैसा बिलकुल ही नही है। पंडरिया विधानसभा की हालात तो स्वयं प्रदेश सरकार के मुखिया जानते हैं। धर्म पर आधारित राजनीति कवर्धा विधानसभा में गत वर्ष से बहुत ज्यादा चल रही है, धार्मिक संतों गुरुओं की पैनी नजर है। सही मायने में कवर्धा कांग्रेस पार्टी के लिए अच्छा है बहुत अच्छा नही .....।

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