चुनावी चर्चा में पंडरिया विधानसभा की हालत बेहद ही खराब।
रामकुमार टण्डन की रिपोर्ट
कवर्धा - छत्तीसगढ़ विधानसभा का चुनाव होने में 5 महीने अभी शेष हैं, दावेदार अभी से अपना नाम दिवालों पर लिखना आरंभ कर क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने में जुट गये है। ये काम पंडरिया क्षेत्र में दिखाई दे रहा है, मानो पंडरिया विधानसभा क्षेत्र नेताओं के लिए अनाथालय बन गया है। जो भी बहारी पंक्षी उड़कर आता है, और अपना घोंसला बना लेता है। शायद इस बात् को ध्यान में रखकर अपनी जाति संख्या को सामने रखकर पार्टी के सामने टिकट मांगने का मौका तलाशते हैं। पार्टी ने भी जाति विशेष की संख्या का आंकलन कर् टिकट बंटाने का प्रयास भी करती है। इस फेर में कांग्रेस भाजपा दोनों पार्टी से अधिकाधिक लोग कवर्धा एवं अन्य विधानसभा से भी नेताओं का नाम आ रहा है। ठीक भी है न साहेब बहती गंगा में सभी गोता लगाना चाहते हैं, कोई बन्दिश् भी नही है।
कांग्रेस के नेता लोग पंडरिया विधानसभा जितना आसान मानकर चल रहे है, वैसा बिलकुल नही है। पंडरिया में कांग्रेस का रास्ता इतना खराब है, की इस बार 2023 का चुनाव में प्रत्याशी कोई भी हो आसान नही है। काम-काज, मेल मिलाप, अपने पराये को पहचाने आर्थिक लाभ अर्जित करने को ज्यादा दृष्टिगत रखकर महत्वाकांक्षी होने के वजह से कांग्रेस की हालत यहाँ बहुत ज्यादा खराब है। छत्तीसगढ़ के 90 विधानसभा में से सभी को जीता जा सकता है, किन्तु पंडरिया को जितना मुश्किल ही नही नामुकिन नजर आता है। क्योंकि 1984 मे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में अविभाजित मध्यप्रदेश के समय यहाँ के प्रत्याशी भारी विरोध के बौजूद रिपीट होने पर हार का मुंह देखना पड़ा था। मौजूदा हालात उससे भी ज्यादा खराब है। संगठन में जिला से लेकर ब्लाक पदाधिकारी स्थानीय छेत्रिय जनप्रतिनिधियों मे पकड़ बहुत ही ज्यादा कमजोर है। गांव-गांव में जनता के बीच भी सरकार से नाराजगी तो नही है, लेकिन स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर देखा सुना जा सकता है।
कमोवेश भाजपा की हालत भी बहुत ज्यादा अच्छा नही लगता है। जिन नेताओं का नाम आगामी विधानसभा के लिए आता है, उनमे भी जातिवादी राजनीति करने का आरोप लगता है, उनका और बाहरी नेताओं का नाम लिया जा रहा है। हालांकि राष्ट्रीय राजनितिक दल के प्रत्याशी को लोग अपना वोट देना ज्यादा पसंद करते हैं, किन्तु इस बार चुनाव बहुकोणीय होने की संभावना दिखाई दे रही है। बसपा पिछले चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय बना दिया था, इस बार गोंडवाना गणतंत्र पार्टी, स्वर्गीय अजीत जोगी की पार्टी के साथ अन्य भी मैदान में होंगे। कुछ नेताओं को कांग्रेस भाजपा से टिकट नही मिलने से राजनितिक शाख भी दांव पर अंतिम बार लग सकती है। इस लिहाज से भी चुनाव बड़ा दिलचस्प हो सकता है।
ये तो हुई पंडरिया की चुनावी चर्चा पर कवर्धा की बात की जाय तो वर्तमान विधायक के सामने कांग्रेस में अपनी अपनी जाति संख्या भारी बताकर टिकट मांगने वाले नेताओं की हिम्मत नही है, की कोई दावेदारी भी करे, वहीं भाजपा में भी सीधा टक्कर लेने वालों की कमी है। जनता ने तो इस दिग्गज को एक नगर पालिका के पार्षद के सामने बौना बना दिया था, फिर भी कांग्रेस के नेताओं में कोई कवर्धा से टिकट मांगने की हिम्मत नही कर पा रहे हैं। सभी पंडरिया विधानसभा में नजर लगा रखे हैं। बहरहाल अभी राजनीति की ऊंट किस करवट बैठने वाली है, जनता देख समझ रही है।